श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  » 
 
 
 
 
अध्याय 1:  भगवान् श्रीकृष्ण का अवतार: परिचय
 
अध्याय 2:  देवताओं द्वारा गर्भस्थ कृष्ण की स्तुति
 
अध्याय 3:  कृष्ण जन्म
 
अध्याय 4:  राजा कंस के अत्याचार
 
अध्याय 5:  नन्द महाराज तथा वसुदेव की भेंट
 
अध्याय 6:  पूतना वध
 
अध्याय 7:  तृणावर्त का वध
 
अध्याय 8:  भगवान् कृष्ण द्वारा अपने मुख के भीतर विराट रूप का प्रदर्शन
 
अध्याय 9:  माता यशोदा द्वारा कृष्ण का बाँधा जाना
 
अध्याय 10:  यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार
 
अध्याय 11:  कृष्ण की बाल-लीलाएँ
 
अध्याय 12:  अघासुर का वध
 
अध्याय 13:  ब्रह्मा द्वारा बालकों तथा बछड़ों की चोरी
 
अध्याय 14:  ब्रह्मा द्वारा कृष्ण की स्तुति
 
अध्याय 15:  धेनुकासुर का वध
 
अध्याय 16:  कृष्ण द्वारा कालिय नाग को प्रताडऩा
 
अध्याय 17:  कालिय का इतिहास
 
अध्याय 18:  भगवान् बलराम द्वारा प्रलम्बासुर का वध
 
अध्याय 19:  दावानल पान
 
अध्याय 20:  वृन्दावन में वर्षा ऋतु तथा शरद् ऋतु
 
अध्याय 21:  गोपियों द्वारा कृष्ण के वेणुगीत की सराहना
 
अध्याय 22:  कृष्ण द्वारा अविवाहिता गोपियों का चीरहरण
 
अध्याय 23:  ब्राह्मण-पत्नियों को आशीर्वाद
 
अध्याय 24:  गोवर्धन-पूजा
 
अध्याय 25:  कृष्ण द्वारा गोवर्धन-धारण
 
अध्याय 26:  अद्भुत कृष्ण
 
अध्याय 27:  इन्द्रदेव तथा माता सुरभि द्वारा स्तुति
 
अध्याय 28:  कृष्ण द्वारा वरुणलोक से नन्द महाराज की रक्षा
 
अध्याय 29:  रासनृत्य के लिए कृष्ण तथा गोपियों का मिलन
 
अध्याय 30:  गोपियों द्वारा कृष्ण की खोज
 
अध्याय 31:  गोपियों के विरह गीत
 
अध्याय 32:  पुन: मिलाप
 
अध्याय 33:  रास नृत्य
 
अध्याय 34:  नन्द महाराज की रक्षा तथा शंखचूड़ का वध
 
अध्याय 35:  कृष्ण के वनविहार के समय गोपियों द्वारा कृष्ण का गायन
 
अध्याय 36:  वृषभासुर अरिष्ट का वध
 
अध्याय 37:  केशी तथा व्योम असुरों का वध
 
अध्याय 38:  वृन्दावन में अक्रूर का आगमन
 
अध्याय 39:  अक्रूर द्वारा दर्शन
 
अध्याय 40:  अक्रूर द्वारा स्तुति
 
अध्याय 41:  कृष्ण तथा बलराम का मथुरा में प्रवेश
 
अध्याय 42:  यज्ञ के धनुष का टूटना
 
अध्याय 43:  कृष्ण द्वारा कुवलयापीड हाथी का वध
 
अध्याय 44:  कंस वध
 
अध्याय 45:  कृष्ण द्वारा अपने गुरु-पुत्र की रक्षा
 
अध्याय 46:  उद्धव की वृन्दावन यात्रा
 
अध्याय 47:  भ्रमर गीत
 
अध्याय 48:  कृष्ण द्वारा अपने भक्तों की तुष्टि
 
अध्याय 49:  अक्रूर का हस्तिनापुर जाना
 
अध्याय 50:  कृष्ण द्वारा द्वारकापुरी की स्थापना
 
अध्याय 51:  मुचुकुन्द का उद्धार
 
अध्याय 52:  भगवान् कृष्ण के लिए रुक्मिणी-संदेश
 
अध्याय 53:  कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का अपहरण
 
अध्याय 54:  कृष्ण-रुक्मिणी विवाह
 
अध्याय 55:  प्रद्युम्न-कथा
 
अध्याय 56:  स्यमन्तक मणि
 
अध्याय 57:  सत्राजित की हत्या और मणि की वापसी
 
अध्याय 58:  श्रीकृष्ण का पाँच राजकुमारियों से विवाह
 
अध्याय 59:  नरकासुर का वध
 
अध्याय 60:  रुक्मिणी के साथ कृष्ण का परिहास
 
अध्याय 61:  बलराम द्वारा रुक्मी का वध
 
अध्याय 62:  ऊषा-अनिरुद्ध मिलन
 
अध्याय 63:  बाणासुर और भगवान् कृष्ण का युद्ध
 
अध्याय 64:  राजा नृग का उद्धार
 
अध्याय 65:  बलराम का वृन्दावन जाना
 
अध्याय 66:  पौण्ड्रक—छद्म वासुदेव
 
अध्याय 67:  बलराम द्वारा द्विविद वानर का वध
 
अध्याय 68:  साम्ब का विवाह
 
अध्याय 69:  नारद मुनि द्वारा द्वारका में भगवान्
 
अध्याय 70:  भगवान् कृष्ण की दैनिक चर्या
 
अध्याय 71:  भगवान् की इन्द्रप्रस्थ यात्रा
 
अध्याय 72:  जरासन्ध असुर का वध
 
अध्याय 73:  बन्दी-गृह से छुड़ाये गये राजाओं को कृष्ण द्वारा आशीर्वाद
 
अध्याय 74:  राजसूय यज्ञ में शिशुपाल का उद्धार
 
अध्याय 75:  दुर्योधन का मानमर्दन
 
अध्याय 76:  शाल्व तथा वृष्णियों के मध्य युद्ध
 
अध्याय 77:  कृष्ण द्वारा शाल्व का वध
 
अध्याय 78:  दन्तवक्र, विदूरथ तथा रोमहर्षण का वध
 
अध्याय 79:  भगवान् बलराम की तीर्थयात्रा
 
अध्याय 80:  द्वारका में भगवान् श्रीकृष्ण से ब्राह्मण सुदामा की भेंट
 
अध्याय 81:  भगवान् द्वारा सुदामा ब्राह्मण को वरदान
 
अध्याय 82:  वृन्दावनवासियों से कृष्ण तथा बलराम की भेंट
 
अध्याय 83:  कृष्ण की रानियों से द्रौपदी की भेंट
 
अध्याय 84:  कुरुक्षेत्र में ऋषियों के उपदेश
 
अध्याय 85:  कृष्ण द्वारा वसुदेव को उपदेश दिया जाना तथा देवकी-पुत्रों की वापसी
 
अध्याय 86:  अर्जुन द्वारा सुभद्रा-हरण तथा कृष्ण द्वारा अपने भक्तों को आशीर्वाद दिया जाना
 
अध्याय 87:  साक्षात् वेदों द्वारा स्तुति
 
अध्याय 88:  वृकासुर से शिवजी की रक्षा
 
अध्याय 89:  कृष्ण तथा अर्जुन द्वारा ब्राह्मण-पुत्रों का
 
अध्याय 90:  भगवान् कृष्ण की महिमाओं का सारांश
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥