श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 14: भौतिक संसार भोग का एक विकट वन  » 
 
 
 
 
संक्षेप विवरण:  इस अध्याय में भवाटवी (भौतिक जगत रूपी वन) का अर्थ स्पष्ट किया गया है। कभी-कभी वणिकजन अनेक दुर्लभ वस्तुओं का संग्रह करने और उन्हें लाभ सहित नगर में बेचने के लिए वन...
 
श्लोक 1:  राजा परीक्षित् ने जब श्रीशुकदेव गोस्वामी से भौतिक वन का अर्थ स्पष्ट करने के लिए कहा तो उन्होंने इस प्रकार उत्तर दिया—हे राजन्, वणिक की रुचि सदैव धन उपार्जन के प्रति रहती है। कभी-कभी वह लकड़ी तथा मिट्टी जैसी कुछ अल्पमूल्य की वस्तुएँ प्राप्त करने और उन्हें ले जाकर नगर में अच्छे मूल्य में विक्रय करने की आकांक्षा से वन में प्रवेश करता है। इसी प्रकार बद्धजीव लोभवश कुछ भौतिक सुख-लाभ करने की इच्छा से इस भौतिक जगत में प्रवेश करता है। धीरे-धीरे वह वन के सघन भाग में प्रवेश करता है तथा वह यह नहीं जानता कि बाहर कैसे निकले। इस भौतिक जगत में प्रवेश करके शुद्ध जीव सांसारिकता में बँध जाता है, जो भगवान् विष्णु के नियंत्रण में उनकी बहिरंगा शक्ति (माया) उत्पन्न करती है। इस प्रकार जीवात्मा बहिरंगा शक्ति दैवी माया के वशीभूत हो जाता है। स्वतंत्र होने तथा वन में भटकने के कारण वह भगवान् की सेवा में सदैव तत्पर रहने वाले भक्तों का संग प्राप्त नहीं कर पाता। एक बार देहात्मबुद्धि के कारण वह माया के वशीभूत होकर और भौतिक गुणों (सत्त्व, रज् तथा तम्) के द्वारा प्रेरित होकर एक के पश्चात् एक अनेक प्रकार के शरीर धारण करता है। इस प्रकार बद्धजीव कभी स्वर्गलोक तो कभी भूलोक और कभी पाताललोक तथा निम्न योनियों में प्रवेश करता है। इस प्रकार अनेक देहों के कारण वह निरन्तर कष्ट सहन करता है। ये कष्ट तथा पीड़ाएँ कभी-कभी मिश्रित रहती हैं। कभी तो ये असह्य होती हैं, तो कभी नहीं। ये शारीरिक दशाएँ बद्धजीव को मनोकल्पना के कारण प्राप्त होती हैं। वह अपने मन तथा पंचेन्द्रियों का उपयोग ज्ञान-प्राप्ति के लिए करता है और इन्हीं से विभिन्न देहें तथा विभिन्न दशाएँ प्राप्त होती हैं। बहिरंगा शक्ति माया के नियंत्रण में इन इन्द्रियों का उपभोग करके जीव को दुख उठाना पड़ता है। वह वास्तव में छुटकारा पाने की खोज में रहता है, किन्तु सामान्य रूप से वह भटकता है, यद्यपि कभी-कभी अत्यन्त कठिनाई के पश्चात् उसे छुटकारा मिल जाता है। इस प्रकार अस्तित्त्व के लिए संघर्षशील रहने के कारण उसे भगवान् विष्णु के चरणारविन्दों में भ्रमरों के समान अनुरक्त भक्तों की शरण नहीं मिल पाती है।
 
श्लोक 2:  संसार रूपी वन में अनियंत्रित इन्द्रियाँ दस्युओं के समान हैं। बद्धजीव श्रीकृष्णभावनामृत के विकास के लिए कुछ धन अर्जित कर सकता है, किन्तु दुर्भाग्यवश अनियंत्रित इन्द्रियाँ अपनी तुष्टि द्वारा इस धन को लूट लेती हैं; इन्द्रियाँ दस्यु हैं, क्योंकि वे जीव को दर्शन, घ्राण, आस्वाद, स्पर्श, श्रवण, संकल्प-विकल्प तथा कामना में अपना धन व्यर्थ व्यय करने के लिए बाध्य करती हैं। इस प्रकार बद्धजीव अपनी इन्द्रियों को तुष्ट करने के लिए बाध्य हो जाता है, जिससे उसका सारा धन व्यय हो जाता है। यद्यपि यह धन यथार्थत: धार्मिक कृत्यों के सम्पादन हेतु अर्जित हुआ होता है, किन्तु दस्यु-इन्द्रियाँ इसका हरण कर लेती हैं।
 
श्लोक 3:  हे राजन्, इस भौतिक जगत में स्त्री-पुत्रादि नाम से पुकारे जाने वाले कुटुम्बीजन वास्तव में भेडिय़ों तथा शृगालों की भाँति व्यवहार करते हैं। चरवाहा अपनी भेड़ों की रक्षा यथाशक्ति करना चाहता है, किन्तु भेडिय़े तथा लोमडिय़ाँ उन्हें बलपूर्वक उठा ले जाते हैं। इसी प्रकार यद्यपि कंजूस पुरुष सतर्कतापूर्वक अपने धन की चौकसी रखना चाहता है, किन्तु उसके पारिवारिक प्राणी उसकी समस्त सम्पत्तियों को उसके जागरूक रहते हुए भी बलपूर्वक छीन लेते हैं।
 
श्लोक 4:  कृषक प्रतिवर्ष अपने अनाज के खेत को जोतकर सारा घास-फूस निकालता रहता है, तो भी उनके बीज उसमें पड़े रहते हैं और पूरी तरह न जल पाने के कारण खेत में बोये गये पौधों के साथ पुन: उग आते हैं। घास-फूस को जोतकर पलट देने पर भी वे सघन रूप से उगकर निकल आते हैं। इसी प्रकार गृहस्थाश्रम एक कर्मक्षेत्र है। जब तक गृहस्थाश्रम भोगने की कामना पूरी तरह भस्म नहीं कर दी जाती, तब तक वह पुन: पुन: उदय होती रहती है। पात्र में बन्द कपूर को हटा लेने पर भी पात्र से सुगन्ध नहीं जाती। उसी तरह जब तक कामनाओं के बीज विनष्ट नहीं कर दिये जाते, तब तक सकाम कर्म का नाश नहीं होता।
 
श्लोक 5:  सांसारिक सम्पत्ति एवं वैभव में आसक्त गृहस्थाश्रम में बद्धजीव को कभी डाँस तथा मच्छर, तो कभी टिड्डी, शिकारी पक्षी व चूहे सताते हैं। फिर भी वह भौतिक जगत के पथ पर चलता रहता है। अविद्या के कारण वह लोभी बन जाता है और सकाम कर्म में लग जाता है। चूँकि उसका मन इन कार्यकलापों में रमा रहता है इसलिए उसे यह भौतिक जगत नित्य लगता है, यद्यपि यह गंधर्वनगर (हवाई महल) की भाँति अनित्य है।
 
श्लोक 6:  बद्धजीव कभी-कभी इस गंधर्वपुरी में खाता, पीता और स्त्री-प्रसंग करता है। अत्यधिक लगाव के कारण इन्द्रियसुखों के पीछे वह उसी प्रकार दौड़ता है जैसे मरुस्थल में मृगमरीचिका के पीछे हिरण।
 
श्लोक 7:  कभी-कभी जीवात्मा स्वर्ण के नाम से पहचाने जाने वाले पीले मल की वांछा करके उसको पाने के लिए दौड़ता है। यह स्वर्ण भौतिक वैभव एवं ईर्ष्या का साधन है और इसके कारण जीवात्मा अवैध यौन-सम्बन्ध, द्यूत, मांसाहार तथा मादक द्रव्यों के सेवन में तत्पर होने में समर्थ होता है। रजोगुणी व्यक्ति स्वर्ण के रंग से उसी प्रकार आकृष्ट होते हैं जिस प्रकार वन में जाड़े से ठिठुरता मनुष्य दलदल में दिखने वाले प्रकाश को अग्नि समझ बैठता है।
 
श्लोक 8:  कभी-कभी यह बद्धजीव रहने के लिए वासस्थान खोजने एवं अपने शरीर की रक्षा के लिए जल तथा धन प्राप्त करने में लगा रहता है। इन नाना प्रकार की आवश्यकताओं को जुटाने में संलग्न रहने के कारण वह सब कुछ भूल जाता है और भौतिक अस्तित्त्व के जंगल में निरन्तर इधर-उधर दौड़-धूप करता रहता है।
 
श्लोक 9:  कभी-कभी यह बद्ध आत्मा धूल के बवण्डर से अन्धे के समान स्त्री की सुन्दरता को देखता है जिसे प्रमाद कहा जाता है। इस प्रकार से अन्धा होकर वह सुन्दर स्त्री की गोद में जा बैठता है। उस समय उसके विवेक पर भोगेच्छा विजय पाती है। इस प्रकार वह वासना से प्राय: अन्धा हो जाता है और काम-जीवन के समस्त नियमों का उल्लघंन करने लगता है। उसे यह ज्ञान ही नहीं रह जाता कि उसके इस उल्लंघन को अनेक देवता देख रहे हैं। इस प्रकार वह भवितव्य दण्ड को देखे बिना अर्धरात्रि में अवैध यौन सुख का आनन्द लेता है।
 
श्लोक 10:  बद्धजीव कभी स्वत: सांसारिक विषयों का निरर्थकता स्वीकार कर लेता है, तो कभी वह भौतिक सुखों को दुखपूर्ण मानता है। फिर भी अपनी उत्कट देहात्म-बुद्धि के कारण उसकी स्मृति विनष्ट हो जाती है और वह पुन: पुन: भौतिक सुखों के पीछे वैसे ही दौड़ता फिरता है जैसे मरुस्थल में मृगमरीत्विका के पीछे मृग।
 
श्लोक 11:  कभी-कभी बद्धजीव अपने शत्रुओं तथा शासन-कर्मियों की प्रताडऩा से अत्यन्त व्यथित रहता है, जो प्रत्यक्ष रूप से कटु वचन कहते रहते हैं। उस समय उसके हृदय (मन) तथा कान अतीव व्यथित एवं विषादपूर्ण हो जाते हैं। ऐसी प्रताडऩा की तुलना उलूकों तथा झींगुरों की अप्रिय झंकार से की जा सकती है।
 
श्लोक 12:  पूर्वजन्मों में पवित्र कर्मों के कारण बद्ध-आत्मा को इस जीवन में भौतिक सुविधाएँ प्राप्त होती हैं, किन्तु इनके समाप्त हो जाने पर वह ऐसी सम्पदा तथा धन का सहारा लेता है, जो न तो इस जीवन में न ही अगले जीवन में उसके सहायक होते हैं। इसलिए वह जीवित मृत-तुल्य मनुष्यों का जिन के पास ये वस्तुएं होती है, सहारा लेना चाहता है। ऐसे लोग अपवित्र वृक्षों, लताओं और विषैले कुओं के सदृश हैं।
 
श्लोक 13:  कभी-कभी इस संसार अटवी में अपने कष्टों से मुक्ति पाने के लिए बद्धजीव पाखण्डियों के सस्ते आशीर्वाद प्राप्त करता है। तब उनके सम्पर्क से उसकी मति भ्रष्ट हो जाती है। यह उथली नदी में कूदने के समान ही है। इसका परिणाम यही होता है कि उसका सिर फूटता है। इस प्रकार वह गर्मी से प्राप्त दु:खों को शान्त करने में समर्थ नहीं होता तथा दोनों ओर से उस की हानि होती है। यह दिग्भ्रमित बद्धजीव तथाकथित साधुओं एवं स्वामियों की भी शरण में जाता है जो वेदविरुद्ध उपदेश देते हैं। किन्तु इनसे उसे न तो वर्तमान में और न भविष्य में ही लाभ प्राप्त होता है।
 
श्लोक 14:  बद्धजीव जब अन्यों का शोषण करते रहने पर भी इस भौतिक संसार में अपना निर्वाह नहीं कर पाता, तो वह अपने पिता या पुत्र का शोषण करने का प्रयास करता है और उसकी सम्पत्ति हर लेता है भले ही वे अति महत्वहीन ही क्यों न हों। यदि वह पिता, पुत्र या किसी अन्य सम्बन्धी की सम्पत्ति प्राप्त नहीं कर पाता तो यह उन्हें सभी प्रकार के कष्ट देने के लिए उद्यत हो उठता है।
 
श्लोक 15:  इस संसार में गृहस्थाश्रम दावाग्नि के तुल्य है। इसमें तनिक भी सुख नहीं है और मनुष्य क्रमश: अधिकाधिक दुख में उलझता जाता है। पारिवारिक जीवन में चिरन्तन सुख के लिए कुछ भी अनुकूल नहीं होता। गृहस्थाश्रम में रहने के कारण बद्धजीव पश्चात्ताप की अग्नि से संतप्त रहता है। कभी वह अपने को अभागा मानते हुए कोसता है, तो कभी वह कहता है कि पूर्व जीवन में शुभ कर्म न करने के कारण ही वह कष्ट का भागी बन रहा है।
 
श्लोक 16:  शासन-कर्मी सदैव नरभक्षी राक्षसों के सदृश होते हैं। ये शासन-कर्मी कभी-कभी बद्धजीव से रुष्ट हो जाते हैं और उसकी सारी संचित सम्पत्ति उठा ले जाते हैं। इस प्रकार अपने जीवन भर की संचित पूँजी को खोकर बद्धजीव हतोत्साहित हो जाता है। दरअसल, यह उसके लिए प्राणान्त के समान है।
 
श्लोक 17:  कभी-कभी बद्धजीव यह कल्पना करने लगता है कि उसके पिता या बाबा अपने पुत्र या पौत्र के रूप में इस संसार में पुन: आ गए। इस प्रकार उन्हें स्वप्न का सा सुख अनुभव होता है और कभी-कभी बद्धजीव को ऐसी मानसिक कल्पनाओं में सुख मिलता है।
 
श्लोक 18:  गृहस्थाश्रम में नाना प्रकार के यज्ञ तथा कर्मकाण्ड (विशेष रूप से पुत्र-पुत्रियों के लिए विवाह यज्ञ और यज्ञोपवीत संस्कार) करने होते हैं। ये सभी गृहस्थ के कर्तव्य हैं। ये अत्यन्त व्यापक होते हैं और इनको सम्पन्न करना कष्टदायक होता है। इनकी उपमा एक बड़ी पहाड़ी से दी जाती है, जिसे सांसारिक कर्मों में संलग्न होने पर लाँघना ही पड़ता है। जो व्यक्ति इन अनुष्ठानों पर विजय प्राप्त करना चाहता है उसे पहाड़ी में चढ़ते समय काँटों तथा कंकड़ों के चुभने से होने वाली पीड़ा का-सा अनुभव करना होता है। इस प्रकार बद्धजीव को अनन्त यातनाएँ सहनी पड़ती हैं।
 
श्लोक 19:  कभी-कभी शारीरिक भूख और प्यास से त्रस्त बद्धजीव इतना विचलित हो जाता है कि उसका धैर्य टूट जाता है और वह अपने ही प्रिय पुत्रों, पुत्रियों तथा पत्नी पर रुष्ट हो जाता है। इस प्रकार निष्ठुर होने पर उसकी यातना और भी बढ़ जाती है।
 
श्लोक 20:  शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित् से आगे कहते हैं—प्रिय राजन्, निद्रा अजगर के समान है। जो मनुष्य भौतिक जीवनरूप वन में विचरण करते रहते हैं उन्हें निद्रा-अजगर अवश्य ही निगल जाता है। इस अजगर द्वारा डसे जाने के कारण वे अज्ञान-अंधकार में खोये रहते हैं। वे सुदूर वन में मृत शरीर की भाँति फेंक दिये जाते हैं। इस प्रकार बद्धजीव समझ नहीं पाता कि जीवन में क्या हो रहा है।
 
श्लोक 21:  कभी-कभी भौतिक जगत रूपी वन में बद्धजीव सर्पों तथा अन्य जन्तुओं जैसे ईर्ष्यालु शत्रुओं के द्वारा दंशित होता रहता है। शत्रु के छलावे से बद्धजीव अपने प्रतिष्ठित पद से च्युत हो जाता है। चिन्ताकुल होने से उसे ठीक से नींद तक नहीं आती। इस प्रकार वह अधिकाधिक दुखी होता जाता है और क्रमश: अपना ज्ञान तथा चेतना खो बैठता है। उसकी दशा उस स्थायी अन्ध पुरुष के समान हो जाती है जो अज्ञान के अन्धकूप में गिर गया हो।
 
श्लोक 22:  कभी-कभी बद्धजीव इन्द्रिय-तृप्ति से प्राप्त होने वाले क्षणिक सुख की ओर आकर्षित होता है। फलस्वरूप वह अवैध यौन-सम्पर्क में रत होता है अथवा पराये धन को चुराता है। ऐसी अवस्था में वह राजा द्वारा बन्दी बना लिया जाता है। या फिर उस स्त्री का पति या उसका संरक्षक उसे दण्डित करता है। इस प्रकार किंचित् सांसारिक तुष्टि हेतु वह नारकीय स्थिति में जा पड़ता है और बलात्कार, अपहरण, चोरी तथा इसी प्रकार के कृत्यों के लिए कारागार में डाल दिया जाता है।
 
श्लोक 23:  इसीलिए विद्वत्जन तथा अध्यात्मवादीगण कर्म के भौतिक मार्ग (प्रवृत्ति) की भर्त्सना करते हैं, क्योंकि इस जन्म में तथा अगले जन्म में सांसारिक दुखों का आदि स्रोत तथा उसको पल्लवित करने की आधार भूमि वही है।
 
श्लोक 24:  यह बद्धजीव पराये धन को चुराकर या ठगकर किसी तरह से उसे अपने पास रखता है और दण्ड से बच जाता है। तब देवदत्त नामक एक अन्य व्यक्ति इस धन को उससे ठग लेता है। इसी प्रकार विष्णुमित्र नामक एक तीसरा व्यक्ति यह धन देवदत्त से छीन लेता है। यह धन किसी भी दशा में एक स्थान पर टिकता नहीं है। यह एक हाथ से दूसरे हाथ में जाता रहता है। अन्त में इसका कोई उपभोग नहीं कर पाता और यह श्रीभगवान् की सम्पत्ति बन जाता है।
 
श्लोक 25:  भौतिक जगत के तापत्रय से अपनी रक्षा न कर सकने के कारण बद्धजीव अत्यन्त दुखी रहता है और शोकपूर्ण जीवन बिताता है। ये तीन प्रकार के संताप हैं—देवताओं द्वारा दिये जानेवाला मानसिक ताप, (यथा हिमानी हवा तथा चिलचिलाती धूप), अन्य जीवात्माओं द्वारा प्रदत्त ताप तथा मन एवं देह से उत्पन्न होने वाले ताप।
 
श्लोक 26:  जहाँ तक धन के लेन-देन का सम्बन्ध है, यदि कोई मनुष्य किसी दूसरे की एक कौड़ी या इससे भी कम धन ठग लेता है, तो वे परस्पर शत्रु बन जाते हैं।
 
श्लोक 27:  इस भौतिक जगत में अनेकानेक कठिनाइयाँ आती हैं और ये सभी दुर्लंघ्य हैं। इनके अतिरिक्त तथाकथित सुख, दुख, राग, द्वेष, भय, अभिमान, प्रमाद, उन्माद, शोक, मोह, लोभ, मत्सर, ईर्ष्या, अपमान, क्षुधा, पिपासा, आधि, व्याधि तथा जन्म, जरा, मरण से उत्पन्न होने वाली बाधाएँ आती हैं। ये सभी मिलकर संसारी बद्धजीव को दुख के अतिरिक्त और कुछ नहीं दे पातीं।
 
श्लोक 28:  कभी-कभी बद्धजीव प्रमादवश मूर्तिमान माया (अपनी पत्नी या प्रेयसी) से आकर्षित होकर स्त्री द्वारा आलिंगन किये जाने के लिए व्याकुल हो उठता है। इस प्रकार वह अपनी बुद्धि तथा जीवन-उद्देश्य के ज्ञान को खो देता है। उस समय वह आध्यात्मिक अनुशीलन का प्रयास न करके अपनी पत्नी या प्रेयसी में अत्यधिक अनुरक्त हो जाता है और उसके लिए उपयुक्त गृह आदि उपलब्ध कराने का प्रयत्न करता है, फिर वह इस घरबार में अत्यधिक व्यस्त हो जाता है और अपनी पत्नी तथा बच्चों की बातों, चितवनों तथा कार्यकलापों में फँस जाता है। इस प्रकार वह कृष्णभावनामृत से वंचित होकर लौकिक अस्तित्व के गहन अंधकार में गिर जाता है।
 
श्लोक 29:  श्रीकृष्ण द्वारा प्रयुक्त निजी आयुध हरिचक्र कहलाता है। यह चक्र कालचक्र है। यह परमाणुओं से लेकर ब्रह्मा की मृत्युपर्यन्त फैला हुआ है और यह समस्त कर्मों को नियंत्रित करने वाला है। यह निरन्तर घूमता रहता है और ब्रह्माजी से लेकर क्षुद्रातिक्षुद्र तृण तक सभी जीवात्माओं का संहार करता है। इस प्रकार प्राणी बाल्यपन से यौवन तथा प्रौढ़ अवस्था को प्राप्त करते हुए जीवन के अन्त तक पहुँच जाता है। काल के इस चक्र को रोक पाना असम्भव है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का निजी आयुध होने के कारण यह अत्यन्त कठोर है। कभी-कभी बद्धजीव मृत्यु को निकट आया जानकर ऐसे व्यक्ति की पूजा करने लगता है जो उसे आसन्न संकट से उबार सके। वह ऐसे श्रीभगवान् की परवाह नहीं करता जिनका आयुध अथक काल है। उल्टे वह अप्रामाणिक शास्त्रों में वर्णित मानवनिर्मित देवताओं की शरण में जाता है। ऐसे देवता बाज, गीध, बगुले तथा कौवे के तुल्य हैं। वैदिक शास्त्रों में इनका वर्णन नहीं मिलता। पास खड़ी मृत्यु शेर के आक्रमण की तरह है, जिससे न तो गीध, बाज, कौवे और न ही बगुले बच सकते हैं। जो पुरुष ऐसे अप्रामाणिक मानवनिर्मित देवताओं की शरण में जाता है उसे मृत्यु के चंगुल से नहीं छुड़ाया जा सकता।
 
श्लोक 30:  ऐसे छद्म-स्वामी, योगी तथा अवतारी जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् में विश्वास नहीं करते, पाषण्डी कहलाते हैं। वे स्वयं पतित होते हैं और ठगे जाते हैं, क्योंकि वे आध्यात्मिक उन्नति का वास्तविक मार्ग नहीं जानते, अत: उनके पास जो भी जाता है, वही ठगा जाता है। इस प्रकार से ठगे जाने पर वह कभी-कभी वैदिक नियमों के असली उपासकों (ब्राह्मणों अथवा कृष्णभावनामृत वालों) की शरण में जाता है, जो सबों को वेदोक्त आचार से श्रीभगवान् की उपासना करना सिखाते हैं। किन्तु इन रीतियों का पालन न कर सकने के कारण ये धूर्त पुन: पतित होते हैं और शूद्रों की शरण लेते हैं, जो विषयभोग में मग्न रहने में पटु हैं। वानर जैसे पशुओं में मैथुन अत्यन्त प्रकट रहता है और ऐसे मैथुन-प्रेमी व्यक्तियों को वानर की सन्तान कहा जा सकता है।
 
श्लोक 31:  इस प्रकार वानरों की सन्तानें एक दूसरे से घुलती-मिलती हैं और सामान्य रूप से शूद्र कहलाती हैं। मुक्त भाव से वे जीवन का उद्देश्य समझे बिना स्वच्छन्द विहार करती हैं। वे एक दूसरे के मुख को देखकर ही मुग्ध होती रहती हैं, क्योंकि इससे इन्द्रिय-तुष्टि की स्मृति बनी रहती है। वे निरन्तर सांसारिक कर्म में लगी रहती हैं, जिसे “ग्राम्य-कर्म” कहते हैं और भौतिक लाभ के लिए कठिन श्रम करती हैं। इस प्रकार वे भूल जाती हैं कि एक दिन उनकी लघु जीवन- अवधि समाप्त हो जाएगी और वे आवागमन के चक्र में नीचे गिर जाएँगी।
 
श्लोक 32:  जिस प्रकार वानर एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर कूदता रहता हैं, उसी प्रकार बद्धजीव एक देह से दूसरी में जाता रहता है। जब कोई शिकारी अन्ततोगत्वा वानर को बन्दी बना लेता है, तो वह छूटकर निकल नहीं पाता। उसी प्रकार यह बद्धजीव क्षणिक इन्द्रिय तृप्ति में फँसकर भिन्न-भिन्न प्रकार की देहों से आसक्त होकर गृहस्थ जीवन में बद्ध जाता है। गृहस्थ जीवन में बद्धजीव को क्षणिक इन्द्रियसुख का आनंद प्राप्त होता है और इस प्रकार वह सांसारिक चंगुल से निकलने में सर्वथा असमर्थ हो जाता है।
 
श्लोक 33:  बद्धजीव इस भौतिक जगत में भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को भूलकर तथा श्रीकृष्णभावनामृत की परवाह किये बिना अनेकानेक दुष्कर्मों एवं पापों में प्रवृत्त होने लगता है। तब उसे ताप-त्रय से पीडि़त होना पड़ता है और वह मृत्यु रूपी हाथी के भय से पर्वत की गुफा के घनान्धकार में जा गिरता है।
 
श्लोक 34:  बद्धजीव को अनेक दैहिक कष्ट सहन करने पड़ते हैं यथा अत्यधिक ठंड तथा तेज हवा। वह अन्य जीवात्माओं के कार्यकलापों तथा प्राकृतिक प्रकोपों के कारण भी कष्ट उठाता है। जब वह उनका सामना करने में अक्षम होकर दयनीय अवस्था में रहता है, तो स्वभावत: वह अत्यन्त खिन्न हो उठता है, क्योंकि वह सांसारिक सुविधाओं का भोग करना चाहता है।
 
श्लोक 35:  कभी-कभी बद्धजीव परस्पर आदान-प्रदान करते हैं, किन्तु कालान्तर में ठगी के कारण उनमें शत्रुता उत्पन्न हो जाती है। भले ही रंचमात्र लाभ हो, बद्धजीव परस्पर मित्र न रहकर एक दूसरे के शत्रु बन जाते हैं।
 
श्लोक 36:  कभी-कभी धनाभाव के कारण बद्धजीव को पर्याप्त स्थान प्राप्त करने में कठिनाई होती है। कभी तो उसे बैठने तक के लिए स्थान नहीं मिल पाता, न ही उसे अन्य आवश्यक वस्तुएँ ही प्राप्त होती हैं। दूसरे शब्दों में, वह अभाव का अनुभव करता है और नैतिक साधनों से इन आवश्यकताओं को न प्राप्त कर पाने के कारण वह अनैतिक ढंग से दूसरों की सम्पत्ति का अपहरण करता है। जब उसे वांछित वस्तुएँ प्राप्त नहीं हो पातीं वह दूसरों से अपमान ही प्राप्त करता है, जिससे वह अत्यन्त खिन्न हो उठता है।
 
श्लोक 37:  अपनी इच्छाओं की बारम्बार पूर्ति के लिए मनुष्य परस्पर शत्रु होने पर भी कभी-कभी विवाह सम्बध स्थापित कर लेते हैं। दुर्भाग्यवश ये विवाह दीर्घकाल तक नहीं चल पाते और ऐसे लोग तलाक या अन्य कारणों से पुन: विलग हो जाते हैं।
 
श्लोक 38:  इस भौतिक जगत का मार्ग क्लेशमय है और बद्धजीव को अनेक कष्ट विचलित करते रहते हैं। कभी वह हारता है, तो कभी जीतता है। प्रत्येक दशा में यह मार्ग विघ्नों से परिपूर्ण है। कभी बद्धजीव अपने पिता से मृत्यु होने या अन्य कारणों से विलग हो जाता है। वह उसे छोडक़र क्रमश: अन्यों से, यथा अपनी सन्तान से आसक्त हो जाता है। इस प्रकार बद्धजीव कभी-कभी भ्रमित और कभी भयके मारे जोर जोर से चीत्कार करता है। कभी वह अपने परिवार का भरण करते हुए प्रसन्न होता है, तो कभी अत्यधिक प्रसन्न हो जाता है और सुरीले गीत गाता है। इस तरह वह अनन्त काल से श्रीभगवान् के विछोह को भूलकर अपने में बँधता जाता है। उसे भौतिक जगत के भयानक पथ पर चलना तो पड़ता है, किन्तु वह इस पथ पर तनिक भी सुखी नहीं होता। स्वरूप-सिद्ध मनुष्य इस भयानक पथ से छूटने के निमित्त श्रीभगवान् की शरण ग्रहण करते हैं। भक्तिमार्ग को स्वीकार किये बिना भौतिक जगत के चंगुल से कोई नहीं निकल पाता। तात्पर्य यह है कि इस भौतिक जीवन में कोई भी प्रसन्न नहीं हो सकता है। उसे कृष्णाभावनामृत का आश्रय अवश्य ग्रहण करना चाहिए।
 
श्लोक 39:  समस्त जीवात्माओं के मित्र मुनिजन संयतात्मा होते हैं। वे अपनी इन्द्रियों एवं मन को वश में कर चुके होते हैं और उन्हें मुक्तिपथ, जो श्रीभगवान् तक पहुँचने का मार्ग है, सरलतापूर्वक प्राप्त होता है। क्लेशमय भौतिक परिस्थितियों में संलग्न रहने तथा हतभाग्य होने के कारण भौतिकतावादी व्यक्ति मुनिजनों की संगति नहीं कर पाता।
 
श्लोक 40:  साधु प्रकृति वाले ऐसे अनेक महान् राजर्षि हो चुके हैं, जो यज्ञ अनुष्ठान में अत्यन्त प्रवीण तथा अन्य राज्यों को जीतने में परम कुशल थे, किन्तु इतनी शक्ति होने पर भी भगवान् की प्रेमाभक्ति नहीं कर पाये, क्योंकि वे महान् राजा, “मैं देह-स्वरूप हूँ और यह मेरी सम्पत्ति है” इस मिथ्या बोध को भी नहीं जीत पाये थे। इस प्रकार उन्होंने प्रतिद्वन्द्वी राजाओं से केवल शत्रुता मोल ली, उनसे युद्ध किया और वे जीवन के वास्तविक लक्ष्य को पूरा किये बिना दिवंगत हो गए।
 
श्लोक 41:  सकाम कर्म रूपी लता की शरण स्वीकार कर लेने पर बद्धजीव अपने पवित्र कार्यों के फलस्वरूप स्वर्गलोक को प्राप्त हो सकता है और इस तरह नारकीय स्थिति से तो उसे मुक्ति मिल सकती है, किन्तु वह दुर्भाग्यवश वहाँ रह नहीं पाता। अपने पवित्र कार्यों का फल भोगने के बाद उसे निम्न लोकों में लौटना पड़ता है। इस प्रकार वह निरन्तर ऊपर और नीचे आता-जाता रहता है।
 
श्लोक 42:  जड़भरत के उपदेशों का सार सुना चुकने के पश्चात् श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा—प्रिय राजा परीक्षित्, जड़भरत द्वारा निर्दिष्ट पथ श्रीभगवान् के वाहन गरुड़ द्वारा अनुगमन किये गये पथ के तुल्य है और सामान्य राजागण मक्खियों के समान हैं। मक्खियाँ गरुड़ के पथ पर नहीं जा सकतीं। आज तक बड़े-बड़े राजाओं तथा विजयी नेताओं में से किसी ने भी भक्ति-पथ का अनुसरण नहीं किया मानसिक रूप से भी नहीं।
 
श्लोक 43:  महाराज भरत ने अपनी युवावस्था में ही सब कुछ परित्याग कर दिया, क्योंकि वे उत्तमश्लोक श्रीभगवान् की सेवा करना चाहते थे। उन्होंने अपनी सुन्दर पत्नी, उत्तम सन्तान, प्रिय मित्र तथा अपने विशाल साम्राज्य का परित्याग कर दिया। यद्यपि इन वस्तुओं का त्याग कर पाना अत्यन्त कठिन होता है, किन्तु जड़भरत इतने उच्चस्थ थे कि उन्होंने इनको उस तरह से त्याग दिया जैसे मल त्याग के पश्चात् विष्टा को त्याग दिया जाता है।
 
श्लोक 44:  श्रीशुकदेव गोस्वामी आगे कहते हैं—हे राजन्, भरत महाराज के कार्य आश्चर्यजनक हैं। उन्होंने अपनी प्रत्येक वस्तु का परित्याग कर दिया जो अन्यों के लिए दुष्कर है। उन्होंने अपना साम्राज्य, पत्नी तथा परिवार त्याग दिया। उनका वैभव इतना प्रभूत था कि देवताओं को भी ईर्ष्या होती थी, किन्तु उसका भी उन्होंने परित्याग कर दिया। उनके समान महान् पुरुष के लिए महान् भक्त होना सर्वथा उपयुक्त था। वे प्रत्येक वस्तु का इसलिए परित्याग कर सके, क्योंकि वे भगवान् श्रीकृष्ण के सौन्दर्य, ऐश्वर्य, यश, ज्ञान, शक्ति तथा त्याग के प्रति अत्यन्त अनुरक्त थे। कृष्ण इतने आकर्षक हैं कि उनके लिए समस्त इष्ट वस्तुओं का परित्याग किया जा सकता है। जिनके चित्त भगवान् की सेवा के प्रति आकृष्ट हैं, वे मुक्ति को भी तुच्छ मानते हैं।
 
श्लोक 45:  मृग देह धारण करने पर भी महाराज भरत ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को विस्मृत नहीं किया; अत: जब वे मृग देह छोडऩे लगे तो उच्च स्वर से इस प्रकार प्रार्थना की, “पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् साक्षात् यज्ञ पुरुष हैं। वे अनुष्ठानों का फल देने वाले हैं। वे धर्म रक्षक, योगस्वरूप, सर्वज्ञानस्रोत (सांख्य के प्रतिपाद्य), सम्पूर्ण सृष्टि के नियामक तथा प्रत्येक जीवात्मा में स्थित परमात्मा हैं। वे सुन्दर तथा आकर्षक हैं। मैं उनको नमस्कार करके यह देह त्याग रहा हूँ और आशा करता हूँ कि उनकी दिव्य सेवा में अहर्निश संलग्न रहूँगा।” यह कह कर महाराज भरत ने अपना शरीर त्याग दिया।
 
श्लोक 46:  श्रवण तथा कीर्तन के अनुरागी भक्त नियमित रूप से भरत महाराज के गुणों की विवेचना तथा उनके कर्मों की प्रशंसा करते हैं। यदि कोई विनीत भाव से सर्व कल्याणमय महाराज भरत के विषय में श्रवण तथा कीर्तन करता है, तो उसकी आयु तथा सांसारिक वैभव में वृद्धि होती है। वह अत्यन्त प्रसिद्ध हो सकता है और सरलता से स्वर्ग अथवा श्रीभगवान् में एकाकार होकर मुक्ति प्राप्त कर सकता है। महाराज भरत के कर्मों के श्रवण, कीर्तन तथा स्तवन मात्र से मनोवांछित फल मिलता है। इस प्रकार मनुष्य की समस्त भौतिक तथा आध्यात्मिक आकांक्षाओं की पूर्ति होती है। इन वस्तुओं के लिए और किसी से माँगने की आवश्यकता नहीं रह जाती, क्योंकि महाराज भरत के जीवन के अध्ययन मात्र से सभी वांछित वस्तुएँ प्राप्त हो जाती हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥