श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 16: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
चतुर्ष्वेतेषु चूतजम्बूकदम्बन्यग्रोधाश्चत्वार: पादप प्रवरा: पर्वतकेतव इवाधिसहस्रयोजनोन्नाहास्तावद् विटपविततय: शतयोजनपरिणाहा: ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
चतुर्षु—चारों पर; एतेषु—मन्दर इत्यादि इन चारों पर; चूत-जम्बू-कदम्ब—आम, जामुन तथा कदम्ब जैसे वृक्ष; न्यग्रोधा:— (तथा) वट वृक्ष; चत्वार:—चार प्रकार के; पादप-प्रवरा:—वृक्षों में श्रेष्ठ; पर्वत-केतव:—पर्वतों पर ध्वजाएँ; इव—सदृश; अधि—ऊपर; सहस्र-योजन-उन्नाहा:—एक हजार योजन ऊँचा; तावत्—इतना भी; विटप-विततय:—शाखाओं की लम्बाई; शत-योजन—एक सौ योजन; परिणाहा:—चौड़ी ।.
 
अनुवाद
 
 इन चारों पर्वतों की चोटियों पर ध्वजाओं के रूप में एक एक आम्र, जामुन, कदम्ब तथा वट वृक्ष हैं। इन वृक्षों का घेरा १०० योजन (८०० मील) तथा ऊँचाई १,१०० योजन (८,८०० मील) है। इनकी शाखाएँ १,१०० योजन की त्रिज्या में फैली हैं।
 
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥