श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 16: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक
ह्रदाश्चत्वार: पयोमध्विक्षुरसमृष्टजला यदुपस्पर्शिन उपदेवगणा योगैश्वर्याणि स्वाभाविकानि भरतर्षभ धारयन्ति ॥ १३ ॥ देवोद्यानानि च भवन्ति चत्वारि नन्दनं चैत्ररथं वैभ्राजकं सर्वतोभद्रमिति ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
ह्रदा:—सरोवर; चत्वार:—चार; पय:—दुग्ध; मधु—शहद; इक्षु-रस—गन्ने का रस; मृष्ट-जला:—विशुद्ध जल से पूरित; यत्—जिसका; उपस्पर्शिन:—तरल पदार्थों का प्रयोग करनेवाले; उपदेव-गणा:—देवतागण; योग-ऐश्वर्याणि—योग की समस्त सिद्धियाँ; स्वाभाविकानि—सरलता से; भरत-ऋषभ—हे भरतवंश में श्रेष्ठ; धारयन्ति—धारण करते हैं; देव-उद्यानानि—स्वर्गिक उद्यान; च—भी; भवन्ति—हैं; चत्वारि—चार; नन्दनम्—नन्दनवन; चैत्र-रथम्—चैत्ररथ उद्यान; वैभ्राजकम्—वैभ्राजक उद्यान; सर्वत:-भद्रम्—सर्वतोभद्र उद्यान; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 भरतवंश में श्रेष्ठ, हे महाराज परीक्षित, इन चारों पर्वतों के मध्य में चार विशाल सरोवर हैं। इनमें से पहले का जल दुग्ध की तरह, दूसरे का मधु के सदृश और तीसरे का इक्षुरस की भाँति स्वादिष्ट है। चौथा सरोवर विशुद्ध जल से परिपूर्ण है। इन चारों सरोवरों की सुविधा का उपभोग सिद्ध, चारण तथा गन्धर्व जैसे अपार्थिव प्राणी, जिन्हें देवता भी कहा जाता है, करते हैं। फलस्वरूप उन्हें योग की सहज सिद्धियाँ—यथा, सूक्ष्मतम से सूक्ष्मतर और से रूप धारण करने की शक्तियाँ—प्राप्त हैं। इसके अतिरिक्त चार देव-उद्यान भी हैं, जिनके नाम हैं—नन्दन, चैत्ररथ, वैभ्राजक तथा सर्वतोभद्र। दीर्घतर
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥