श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 16: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
यस्तु महाकदम्ब: सुपार्श्वनिरूढो यास्तस्य कोटरेभ्यो विनि:सृता: पञ्चायामपरिणाहा: पञ्च मधुधारा: सुपार्श्वशिखरात्पतन्त्योऽपरेणात्मानमिलावृतमनुमोदयन्ति ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; तु—किन्तु; महा-कदम्ब:—महाकदम्ब नामक वृक्ष; सुपार्श्व-निरूढ:—जो सुपार्श्व पर्वत की बगल में खड़ा हुआ है; या:—जो; तस्य—उसका; कोटरेभ्य:—कोटर से; विनि:सृता:—प्रवाहित; पञ्च—पाँच; आयाम—व्याम, आठ फुट की माप; परिणाहा:—जिसकी माप; पञ्च—पाँच; मधु-धारा:—मधु की धाराएँ; सुपार्श्व-शिखरात्—सुपार्श्व पर्वत की चोटी से; पतन्त्य:—गिर रही हैं; अपरेण—सुमेरु पर्वत की पश्चिम दिशा में; आत्मानम्—समग्र; इलावृतम्—इलावृत वर्ष को; अनुमोदयन्ति—सुरभित करती हैं ।.
 
अनुवाद
 
 सुपार्श्व पर्वत की बगल में महाकदम्ब नामक अत्यन्त प्रसिद्ध विशाल वृक्ष खड़ा है। इस वृक्ष के कोटर से मधु की पाँच नदियाँ निकलती हैं जिनमें से प्रत्येक लगभग पाँच “व्याम” चौड़ी है। यह प्रवहमान मधु सुपार्श्व पर्वत की चोटी से सतत नीचे गिरता रहता है और इलावृत-वर्ष की पश्चिम दिशा से प्रारम्भ होकर उसके चारों ओर बहता रहता है। इस प्रकार सम्पूर्ण स्थल सुहावनी गंध से पूरित है।
 
तात्पर्य
 दोनों भुजाओं के फैलाने पर एक हथेली से दूसरी के बीच की दूरी “व्याम” कहलाती है जो लगभग आठ फुट होती है। इस प्रकार प्रत्येक नदी की चौड़ाई लगभग चालीस फुट और कुल मिलाकर लगभग दो सौ फुट होगी।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥