श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 16: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
यानुपजुषाणानां न कदाचिदपि प्रजानां वलीपलितक्लमस्वेददौर्गन्ध्यजरामयमृत्युशीतोष्णवैवर्ण्योपसर्गादयस्तापविशेषा भवन्ति यावज्जीवं सुखं निरतिशयमेव ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
यान्—जो (उपर्युक्त नदियों से उत्पन्न होने वाले समस्त पदार्थ); उपजुषाणानाम्—पूर्णरूप से उपभोग करने वाले पुरुषों का; न—नहीं; कदाचित्—किसी भी समय; अपि—निश्चय ही; प्रजानाम्—प्रजा की; वली—झुर्रियाँ; पलित—पके केश; क्लम— थकान; स्वेद—पसीना; दौर्गन्ध्य—पसीने के कारण दुर्गंध; जरा—बुढ़ापा; आमय—रोग; मृत्यु—असामयिक मृत्यु; शीत— कड़ाके की सर्दी; उष्ण—दाहक, गर्मी; वैवर्ण्य—शरीर की कान्ति का धूमिल पडऩा, विवर्णता; उपसर्ग—क्लेश; आदय:— इत्यादि; ताप—दुखों का; विशेषा:—किस्में, प्रकार; भवन्ति—हैं; यावत्—जब तक; जीवम्—जीवन; सुखम्—सुख; निरतिशयम्—अपार, सीमाहीन; एव—केवल ।.
 
अनुवाद
 
 इस भौतिक जगत के वासी जो इन बहती नदियों से प्राप्त पदार्थों का सेवन करते हैं, उनके शरीर में न तो झुर्रियाँ पड़ती हैं और न उनके केश सफेद होते हैं। न तो उन्हें थकान का अनुभव होता है और न उसके पसीने से उनके शरीर से दुर्गन्ध ही आती है। उन्हें बुढ़ापा, रोग या आसामयिक मृत्यु नहीं सताती है न ही वे कड़ाके की सर्दी अथवा झुलसती गर्मी से दुखी होते हैं और न ही उनके शरीर की कान्ति लुप्त होती है। वे सभी मृत्युपर्यन्त चिन्ताओं से मुक्त सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में इसी भौतिक जगत के भीतर मानव समाज की सम्पूर्णता का संकेत है। इस भौतिक जगत की दयनीय दशा को दुग्ध, दही, मधु, घी, गुड़, अन्न, आभूषण, बिस्तर, आसन इत्यादि की प्रचुर मात्रा में पूर्ति करके सुधारा जा सकता है। यही मानवीय सभ्यता है। कृषि कर्म द्वारा प्रचुर अन्न उत्पन्न किया जा सकता है और गो-संवर्धन द्वारा प्रचुर दूध, दही तथा घी की व्यवस्था की जा सकती है। वनों की सुरक्षा करके प्रचुर मधु प्राप्त कर सकते हैं। दुर्भाग्यवश आधुनिक सभ्यता के वशीभूत होकर मनुष्य गायों का वध कर रहे हैं, जो दूध, दही, घी की मूल स्रोत हैं। वे उन वृक्षों का विनाश कर रहे हैं, जो मधु देने वाले हैं। वे कृषिकर्म में संलग्न होने के बजाय कल-पुर्जों, स्वचलित वाहनों तथा मदिरा के कारखानें खोलते जा रहे हैं। तो भला मनुष्य किस प्रकार सुखी रह सकते हैं? उन्हें भौतिकता के समस्त कष्टों का भोग करना होगा। उनके शरीर में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं और धीरे-धीरे उनका क्षय होता रहता है, जिससे वे बौने होने लगते हैं। नाना प्रकार की गर्हित वस्तुओं के खाने से उनके शरीर से पसीना निकलने से दुर्गन्ध निकलती है। यह मानवीय सभ्यता नहीं कहलाती है। यदि सचमुच ही मनुष्य इस जीवन में सुख भोगना चाहते हैं और चाहते हैं कि उनका भावी जीवन सुखमय बने तो उन्हें चाहिए कि वे वैदिक सभ्यता का अनुसरण करें। इस वैदिक सभ्यता में उपर्युक्त सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है।
 
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