श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 16: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक
कुरङ्गकुररकुसुम्भवैकङ्कत्रिकूटशिशिरपतङ्गरुचकनिषधशिनीवासकपिलशङ्खवैदूर्यजारुधिहंसऋषभनागकालञ्जरनारदादयो विंशतिगिरयो मेरो: कर्णिकाया इव केसरभूता मूलदेशे परित उपक्‍ल‍ृप्ता: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
कुरङ्ग—कुरंग; कुरर—कुरर; कुसुम्भ-वैकङ्क-त्रिकूट-शिशिर-पतङ्ग-रुचक-निषध-शिनीवास-कपिल-शङ्ख-वैदूर्य-जारुधि हंस-ऋषभ-नाग-कालञ्जर-नारद—ये सभी पर्वतों के नाम हैं; आदय:—इत्यादि; विंशति-गिरय:—बीस पर्वत; मेरो:—सुमेरु पर्वत के; कर्णिकाया:—कमलकोश के; इव—सदृश; केसर-भूता:—केसर के समान; मूल-देशे—पाद पृष्ठ पर; परित:—चारों ओर; उपक्लृप्ता:—श्रीभगवान् के द्वारा आयोजित ।.
 
अनुवाद
 
 मेरु पर्वत के तलहटी के चारों ओर अन्य पर्वत इस सुन्दर ढंग से व्यवस्थित हैं मानों कमल पुष्प की कर्णिका के चारों ओर केसर हों। इन पर्वतों के नाम हैं—कुरंग, कुरर, कुसुम्भ, वैकंक, त्रिकूट, शिशिर, पतंग, रुचक, निषध, शिनीवास, कपिल, शंख, वैदूर्य, जारुधि, हंस, ऋषभ, नाग, कालञ्जर तथा नारद।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥