श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 16: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
मेरोर्मूर्धनि भगवत आत्मयोनेर्मध्यत उपक्‍ल‍ृप्तां पुरीमयुतयोजनसाहस्रीं समचतुरस्रां शातकौम्भीं वदन्ति ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
मेरो:—सुमेरु पर्वत की; मूर्धनि—चोटी पर; भगवत:—सर्वशक्तिमान प्राणी; आत्म-योने:—भगवान् ब्रह्मा की; मध्यत:—मध्य में; उपकॢप्ताम्—स्थित; पुरीम्—पुरी, विशाल नगरी; अयुत-योजन—दस हजार योजन; साहस्रीम्—एक हजार; सम- चतुरस्राम्—चारों ओर समान लम्बाई का; शात-कौम्भीम्—पूर्णत: सोने की बनी हुई; वदन्ति—मुनियों का कथन है ।.
 
अनुवाद
 
 मेरु की चोटी के मध्य भाग में ब्रह्माजी की पुरी स्थित है। इसके चारों कोने समान रूप से एक करोड़ योजन (आठ करोड़ मील) तक विस्तृत हैं। यह पूरे का पूरा स्वर्ण से निर्मित है, इसीलिए विद्वतजन तथा ऋषि-मुनि इसे शातकौम्भी नाम से पुकारते हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥