श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 16: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
तामनुपरितो लोकपालानामष्टानां यथादिशं यथारूपं तुरीयमानेन पुरोऽष्टावुपक्‍ल‍ृप्ता: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
ताम्—ब्रह्मपुरी नामक इस पुरी को; अनुपरित:—घेरे हुए; लोक-पालानाम्—लोकों के शासक; अष्टानाम्—आठ; यथा दिशम्—दिशाओं के अनुसार; यथा-रूपम्—ब्रह्मपुरी के ही समान; तुरीय-मानेन—माप में केवल एक चतुर्थांश; पुर:—पुरी; अष्टौ—आठ; उपकॢप्ता:—स्थित हैं ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्मपुरी के चारों और सभी दिशाओं में लोकों के आठ प्रमुख लोकपालों के निवास-स्थल हैं, जिनमें से पहला राजा इन्द्र का है। ये निवासस्थल ब्रह्मपुरी के ही समान हैं, किन्तु वे आकार में एक चौथाई हैं।
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इस तथ्य की पुष्टि की है कि लोकों के आठ अधीनस्थ लोकपालों तथा ब्रह्मा की पुरियों का उल्लेख अन्य पुराणों में पाया जाता है—

मेरौ नवपूराणि स्युर्मनोवत्यमरावती तेजोवती संयमनी तथा कृष्णांगना परा।

श्रद्धावती गन्धवती तथा चान्या महोदया यशोवती च ब्रह्मेन्द्र बह्यादीनां यथाक्रमम् ॥

ब्रह्मा की पुरी मनोवती कहलाती है और उनके सहायक इन्द्र तथा अग्नि इत्यादि की पुरियाँ अमरावती, तेजोवती, संयमनी, कृष्णांगना, श्रद्धावती, गंधावती, महोदया तथा यशोवती कहलाती हैं। ब्रह्मपुरी मध्य में स्थित है और शेष आठों पुरियाँ इसके चारों ओर स्थित हैं।

 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के पंचम स्कन्ध के अन्तर्गत “जम्बूद्वीप का वर्णन” नामक सोलहवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥