श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 16: जम्बूद्वीप का वर्णन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
भगवतो गुणमये स्थूलरूप आवेशितं मनो ह्यगुणेऽपि सूक्ष्मतम आत्मज्योतिषि परे ब्रह्मणि भगवति वासुदेवाख्ये क्षममावेशितुं तदु हैतद् गुरोऽर्हस्यनुवर्णयितुमिति ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
भगवत:—श्रीभगवान् का; गुण-मये—भौतिक प्रकृति के त्रिगुण युक्त बाह्यस्वरूपों में; स्थूल-रूपे—स्थूल रूप; आवेशितम्— प्रविष्ट; मन:—मन; हि—निश्चित रूप से; अगुणे—दिव्य इन्द्रियातीत; अपि—यद्यपि; सूक्ष्मतमे—हृद्देश से अपने लघुतर रूप में परमात्मा; आत्म-ज्योतिषि—जो ब्रह्म तेज से पूर्ण है; परे—परम; ब्रह्मणि—आत्मस्वरूप; भगवति—श्रीभगवान् में; वासुदेव- आख्ये—भगवान् वासुदेव के नाम से विख्यात; क्षमम्—उपयुक्त; आवेशितुम्—आत्मसात्; तत्—वह; उ ह—निस्सन्देह; एतत्—यह; गुरो—हे गुरुदेव; अर्हसि अनुवर्णयितुम्—कृपया विस्तारपूर्वक कहें; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 जब मन प्रकृति के गुणों से निर्मित पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के बाह्यरूप—स्थूल विश्व रूप—पर स्थिर हो जाता है, तो उसे शुद्ध सत्त्व की स्थिति प्राप्त होती है। उस दिव्य स्थिति में ही भगवान् वासुदेव को जाना जा सकता है जो अपने सूक्ष्मरूप में स्वत: प्रकाशित और गुणातीत हैं। हे प्रभो, विस्तार से वर्णन करें कि वह रूप जो सारे विश्व में व्याप्त है किस प्रकार देखा जाता है।
 
तात्पर्य
 महाराज परीक्षित को उनके गुरु शुकदेव गोस्वामी ने पहले ही यह उपदेश दे रखा था कि वे श्रीभगवान् के विराट रूप का मनन करें, अत: उन्होंने गुरु के उपदेश का पालन करते हुए उसी रूप का सतत चिन्तन किया। विराट रूप निश्चय ही सांसारिक है, किन्तु प्रत्येक वस्तु श्रीभगवान् का अंश है, अत: अन्तत: कुछ भी सांसारिक नहीं है। फलत: महाराज परीक्षित् का मन आत्मचेतना से संतृप्त था। श्रील रूप गोस्वामी ने कहा है—

प्रापंचिकतया बुद्ध्या हरिसम्बन्धिवस्तुन:।

मुमुक्षुभि: परित्यागो वैराग्यं फल्गु कथ्यते ॥

प्रत्येक वस्तु, यहाँ तक कि भौतिक वस्तु भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से सम्बन्धित है, फलत: प्रत्येक वस्तु को श्रीभगवान् की सेवा में समर्पित कर देना चाहिए। श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने इस श्लोक का अनुवाद वर्णन इस प्रकार किया है—

हरि-सेवाय याहा हय अनुकूल।

विषय बलिया ताहार त्यागे हय भुल ॥

“मनुष्य को चाहिए कि श्रीभगवान् से सम्बद्ध किसी भी वस्तु को यह सोचकर न त्याग दे कि यह भौतिक है अथवा इन्द्रियसुख के हेतु है।” यहाँ तक कि शुद्ध हो जाने पर इन्द्रियाँ भी आध्यात्मिक हो जाती हैं। जब महाराज परीक्षित श्रीभगवान् के विराट रूप का चिन्तन कर रहे थे तो उनका मन निश्चित रूप से दिव्य धरातल पर स्थित था। अत: वे ब्रह्माण्ड के विषय में विस्तृत जानकारी की इच्छा न रखने पर भी श्रीभगवान् की पृष्ठभूमि में उसका चिन्तन कर रहे थे। इसीलिए ऐसा भौगोलिक ज्ञान भौतिक न होकर दिव्य था। श्रीमद्भागवत में अन्यत्र(१.५.२०) नारद मुनि कहते हैं, इदं हि विश्वं भगवान् इवेतर:—यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही श्रीभगवान् है, भले ही यह उनसे भिन्न प्रतीत हो। अत: भले ही परीक्षित महाराज को इस ब्रह्माण्ड के भौगोलिक ज्ञान की आवश्यकता न रही हो, किन्तु वह ज्ञान आध्यात्मिक तथा दिव्य था, क्योंकि वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को श्रीभगवान् की शक्ति का विस्तार मान रहे थे।

हम भी अपने उपदेश कार्य के लिए प्रचुर धन एवं सम्पत्ति का उपयोग करते हैं और अनेकानेक पुस्तकों का क्रय-विक्रय करते हैं। किन्तु चूँकि ये व्यापार कृष्णभावनामृत आन्दोलन से सम्बन्धित होते हैं, अत: इन्हें कभी भी भौतिक नहीं मानना चाहिए। यदि कोई ऐसे प्रबन्ध के विचार में व्यस्त रहता है, तो इसका यह अर्थ नहीं होगा कि वह कृष्णभक्ति से परे है। यदि कोई प्रतिदिन नियमित रूप से सोलह माला महामंत्र का जप करता है, तो कृष्णभावनामृत आन्दोलन के प्रचार के लिए भौतिक जगत से उसका सम्पर्क कृष्णभावनामृत के आध्यात्मिक अनुशीलन से किसी प्रकार भिन्न नहीं कहा जा सकता।

 
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