श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 24: नीचे के स्वर्गीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
न हि तेषां कल्याणानां प्रभवति कुतश्चन मृत्युर्विना भगवत्तेजसश्चक्रापदेशात् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
न हि—नहीं; तेषाम्—उनका; कल्याणानाम्—जो स्वभाव से शुभ होते हैं; प्रभवति—प्रभाव डालने में सक्षम; कुतश्चन—कहीं से भी; मृत्यु:—मृत्यु; विना—के सिवा; भगवत्-तेजस:—श्रीभगवान् की शक्ति का; चक्र-अपदेशात्—सुदर्शन चक्र से ।.
 
अनुवाद
 
 वे अत्यन्त कुशलपूर्वक रहते हैं और काल रूप श्रीभगवान् के सुदर्शन चक्र के अतिरिक्त अन्य किसी साधन द्वारा मृत्यु से भयभीत नहीं हैं।
 
तात्पर्य
 भौतिक जगत का यही दोष है। अधोलोकों में प्रत्येक वस्तु सुचारु रीति से व्यवस्थित है। वहाँ सुन्दर आवास हैं, मोहक वायुमण्डल है और वहाँ शारीरिक क्लेश या मानसिक व्याधियाँ नहीं हैं। तो भी वहाँ जो रहते हैं उन्हें अपने कर्मों के अनुसार दूसरा जन्म ग्रहण करना होता है। मन्द बुद्धि वाले पुरुष सुखोन्मुखी भौतिकतावादी सभ्यता के इस दोष को नहीं समझ सकते। कोई कितना ही क्यों न अपनी इन्द्रियों को भाने वाली परिस्थितियाँ उत्पन्न कर ले, किन्तु, अन्तत: उसे मृत्यु का सामना करना ही पड़ता है। आसुरी सभ्यता के लोग अपनी परिस्थितियों को अत्यन्त सुखद बनाने का प्रयास करते हैं, किन्तु वे मृत्यु को नहीं रोक पाते। तथाकथित सुदर्शन चक्र के प्रभाव से उनका यह तथाकथित भौतिक सुख स्थायी नहीं रह सकता।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥