श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 24: नीचे के स्वर्गीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
अथातले मयपुत्रोऽसुरो बलो निवसति येन ह वा इह सृष्टा: षण्णवतिर्माया: काश्चनाद्यापि मायाविनो धारयन्ति यस्य च जृम्भमाणस्य मुखतस्त्रय: स्त्रीगणा उदपद्यन्त स्वैरिण्य: कामिन्य: पुंश्चल्य इति या वै बिलायनं प्रविष्टं पुरुषं रसेन हाटकाख्येन साधयित्वा स्वविलासावलोकनानुरागस्मितसंलापोपगूहनादिभि: स्वैरं किल रमयन्ति यस्मिन्नुपयुक्ते पुरुष ईश्वरोऽहं सिद्धोऽहमित्ययुतमहागजबलमात्मानमभिमन्यमान: कत्थते मदान्ध इव ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—अब; अतले—अतल नामक लोक पर; मय-पुत्र: असुर:—मय का असुर पुत्र; बल:—बल; निवसति—वास करता है; येन—जिसके द्वारा; ह वा—निस्सन्देह; इह—इसमें; सृष्टा:—रचना की; षट्-णवति:—छियानबे; माया:—माया के प्रकार; काश्चन—कोई; अद्य अपि—आज भी; माया-विन:—मायावी लोग (यथा सोना बनाने वाले); धारयन्ति—उपयोग करते हैं; यस्य—जिसका; च—भी; जृम्भमाणस्य—उवासी लेते हुए; मुखत:—मुख मार्ग से; त्रय:—तीन; स्त्री-गणा:—स्त्रियों के प्रकार; उदपद्यन्त—उत्पन्न हुए; स्वैरिण्य:—स्वैरिणी (जो अपनी ही जाति में ब्याह करती है); कामिन्य:—कामिनी (जो कामवश किसी भी जाति के पुरुष से ब्याह कर लेती है); पुंश्चल्य:—पुंश्चली (जो एक पति को छोडक़र दूसरा पति बनाना चाहती है); इति—इस प्रकार; या:—जो; वै—निश्चय ही; बिल-अयनम्—अधोलोक, बिल-स्वर्ग में; प्रविष्टम्—प्रवेश करके; पुरुषम्—नर; रसेन—रस द्वारा; हाटक-आख्येन—हाटक नामक मादक जड़ी से बना हुआ; साधयित्वा—विषयभोग के लिए सक्षम बनाकर; स्व-विलास—अपने इन्द्रियभोग के लिए; अवलोकन—चितवन से; अनुराग—कामी; स्मित—मन्द हास से; संलाप—बातचीत से; उपगूहन-आदिभि:—आलिंगन आदि से; स्वैरम्—अपनी इच्छानुसार; किल—निस्सन्देह; रमयन्ति—रमण करते हैं; यस्मिन्—जो; उपयुक्ते—उपभोग करने पर; पुरुष:—पुरुष; ईश्वर: अहम्—मैं सर्वशक्तिमान पुरुष हूँ; सिद्ध: अहम्—मैं सिद्ध पुरुष हूँ; इति—इस प्रकार; अयुत—दस हजार; महा-गज—बड़े-बड़े हाथियों की; बलम्—शक्ति; आत्मानम्—अपने आप; अभिमन्यमान:—गर्व से पूर्ण होकर; कत्थते—कहते हैं; मद-अन्ध:—मिथ्या अहंकार से अन्धा; इव—सदृश ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, अब मैं तुमसे अतललोक से प्रारम्भ करके एक एक करके समस्त अधोलोकों का वर्णन करूँगा। अतललोक में मय-दानव का पुत्र बल नामक असुर है, जिसने छियानबे प्रकार की माया रच रखी है। कुछ तथाकथित योगी तथा स्वामी आज भी लोगों को ठगने के लिए इस माया का प्रयोग करते हैं। बल असुर नेउवासी लेने से स्वैरिणी, कामिनी तथा पुंश्चली के नाम से तीन प्रकार की स्त्रियाँ उत्पन्न हुई हैं। स्वैरिणियाँ अपने ही समूह के पुरुष से ब्याह करना पसन्द करती हैं, कामिनियाँ किसी भी वर्ग के पुरुष से ब्याह कर लेती हैं और पुंश्चलियाँ अपना पति बदलती रहती हैं। यदि कोई पुरुष अतललोक में प्रवेश करता है, तो ये स्त्रियाँ तुरन्त ही उसे बन्दी बना कर हाटक नामक जड़ी से बनाये गये मादक पेय को पीने के लिए बाध्य कर देती हैं। इस पेय से मनुष्य में प्रचुर काम-शक्ति जाग्रत होती है, जिसका उपयोग वे स्त्रियाँ अपने सम्भोग हेतु करती हैं। स्त्रियाँ उसे अपनी मोहक चितवन, प्रेमालाप, मन्द मुस्कान तथा आलिंगन इत्यादि के द्वारा मोह लेती हैं। इस प्रकार वे उन्हें अपने साथ संभोग के लिए फुसलाकर जी भर कर कामतृप्ति करती हैं। कामशक्ति बढऩे के कारण मनुष्य अपने को दस हजार हाथियों से भी अधिक बलवान और सक्षम न मानने लगता है। दरअसल मदहोशी के कारण मोहग्रस्त होकर वह सर पर खड़ी मृत्यु की अनदेखी करके अपने आपको ईश्वर समझने लगता है।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥