श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 24: नीचे के स्वर्गीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक
नूनं बतायं भगवानर्थेषु न निष्णातो योऽसाविन्द्रो यस्य सचिवो मन्त्राय वृत एकान्ततो बृहस्पतिस्तमतिहाय स्वयमुपेन्द्रेणात्मानमयाचतात्मनश्चाशिषो नो एव तद्दास्यमतिगम्भीरवयस: कालस्य मन्वन्तरपरिवृत्तं कियल्लोकत्रयमिदम् ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
नूनम्—निश्चय ही; बत—धिक्; अयम्—यह; भगवान्—अत्यन्त विद्वान; अर्थेषु—आत्महित के लिए; न—नहीं; निष्णात:— परम अनुभवी; य:—जो; असौ—स्वर्ग का राजा; इन्द्र:—इन्द्र; यस्य—जिसका; सचिव:—प्रधान मंत्री; मन्त्राय—मंत्रणा के लिए, सलाह के लिए; वृत:—चुना हुआ; एकान्तत:—अकेला; बृहस्पति:—बृहस्पति; तम्—उसको; अतिहाय—उपेक्षा करके; स्वयम्—स्वयं; उपेन्द्रेण—उपेन्द्र (भगवान् वामनदेव) की सहायता से; आत्मानम्—मुझसे; अयाचत—प्रार्थना की; आत्मन:— स्वयं; च—तथा; आशिष:—आशीर्वाद (तीनों लोक); नो—नहीं; एव—ही; तत्-दास्यम्—भगवान् की सप्रेम सेवा; अति— अत्यधिक; गम्भीर-वयस:—अपार अवधि वाला; कालस्य—काल का; मन्वन्तर-परिवृत्तम्—मनु के जीवन के अन्त होने पर परिवर्तित; कियत्—क्या लाभ; लोक-त्रयम्—तीनों लोक; इदम्—इन ।.
 
अनुवाद
 
 धिक्! स्वर्ग का राजा इन्द्र कितना दयनीय है कि अत्यन्त विद्वान और शक्तिमान होकर तथा बृहस्पति को परामर्श हेतु अपना प्रधान बना लेने पर भी आध्यात्मिक उन्नति के विषय में सर्वथा अज्ञानी है। बृहस्पति भी बुद्धिमान नहीं है, क्योंकि उसने अपने शिष्य इन्द्र को उचित शिक्षा नहीं दी। भगवान् वामनदेव इन्द्र के द्वार पर खड़े हुए थे, किन्तु उनसे इन्द्र ने दिव्य सेवा के लिए अवसर का वरदान न माँग कर उन्हें मेरे द्वार पर अपने इन्द्रिय-भोग के लिए तीन लोकों की प्राप्ति के लिए भिक्षा हेतु भेज दिया। तीनों लोकों की प्रभुता अत्यन्त महत्त्वहीन है, क्योंकि मनुष्य के पास चाहे कितना भी ऐश्वर्य क्यों न रहे वह एक मन्वन्तर तक ही चलता है, जो अनन्त काल का एक क्षुद्रांश मात्र है।
 
तात्पर्य
 बलि महाराज इतने शक्तिशाली थे कि उन्होंने इन्द्र से युद्ध करके तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य जमा लिया था। इन्द्र निश्चय ही अत्यन्त बुद्धिमान था, फिर भी उसने भगवान् वामनदेव से उनकी भक्ति में संलग्न होने की बात न कह कर अपने लिए ऐसे धन-धान्य की याचना की जो एक मन्वन्तर में समाप्त हो जाता है। मनु की आयु बहत्तर युग आँकी गई है। एक युग में ४३,००,००० वर्ष होते हैं, अत: मनु का जीवनकाल ३०,९६,००,००० वर्ष हुआ। देवताओं का भौतिक ऐश्वर्य एक मन्वन्तर तक ही रहता है। काल दुस्तर है! नियत काल, भले ही लाखों वर्ष क्यों न हो, तुरन्त बीत जाता है। देवताओं का ऐश्वर्य काल की सीमाओं के भीतर ही रहता है। अत: बलि महाराज को यह पछतावा रहा कि अत्यन्त विद्वान होते हुए भी इन्द्र अपनी बुद्धि का समुचित उपयोग नहीं कर पाया, क्योंकि वामनदेव से भगवान् की भक्ति न माँग कर इन्द्र ने उनका उपयोग भौतिक सम्पत्ति माँगने के लिए किया। यद्यपि इन्द्र बुद्धिमान था और उसका प्रधान मंत्री बृहस्पति भी बुद्धिमान था, किन्तु इनमें से किसी ने भी भगवान् वामनदेव की प्रेमा-भक्ति करने का वर नहीं माँगा। अत: बलि महाराज को इन्द्र पर पछतावा हुआ।
 
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