श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 24: नीचे के स्वर्गीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
यस्यानुदास्यमेवास्मत्पितामह: किल वव्रे न तु स्वपित्र्यं यदुताकुतोभयं पदं दीयमानं भगवत: परमिति भगवतोपरते खलु स्वपितरि ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
यस्य—जिसका (श्रीभगवान् का); अनुदास्यम्—सेवा; एव—निश्चय ही; अस्मत्—हमारा; पिता-मह:—पितामह, बाबा; किल—निस्सन्देह; वव्रे—स्वीकृत; न—नहीं; तु—लेकिन; स्व—अपना; पित्र्यम्—पैतृकसम्पत्ति; यत्—जो; उत—निश्चय ही; अकुत:-भयम्—निर्भीकता; पदम्—पद, स्थान; दीयमानम्—प्रदान किये जाने पर; भगवत:—भगवान् की अपेक्षा; परम्— अन्य; इति—इस प्रकार; भगवता—श्रीभगवान् द्वारा; उपरते—बध किये जाने पर; खलु—निस्संदेह; स्व-पितरि—अपना पिता ।.
 
अनुवाद
 
 बलि महाराज ने कहा—मेरे पितामह प्रह्लाद महाराज ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने आत्महित पहचाना। उनके पिता हिरण्यकशिपु की मृत्यु के पश्चात् भगवान् नृसिंहदेव ने प्रह्लाद को उनके पिता का साम्राज्य प्रदान करने के साथ ही भौतिक बन्धनों से मुक्ति प्रदान करनी चाही, किन्तु प्रह्लाद ने इनमें से किसी को भी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने सोचा कि मुक्ति तथा भौतिक ऐश्वर्य भक्ति में बाधक हैं, अत: श्रीभगवान् से ऐसे वरदान प्राप्त कर लेना भगवान् का वास्तविक अनुग्रह नहीं है। फलस्वरूप कर्म तथा ज्ञान के फलों को न स्वीकार करते हुए प्रह्लाद महाराज ने भगवान् से केवल उनके दास की भक्ति में अनुरक्त रहने का वर माँगा।
 
तात्पर्य
 श्री चैतन्य महाप्रभु का उपदेश है कि शुद्ध भक्त अपने को परमेश्वर के दास का भी दास माने (गोपीभर्तु: पादकमलयोर् दासदासानुदास: )। वैष्णव दर्शन में किसी को प्रत्यक्ष दास नहीं बनना चाहिए। प्रह्लाद महाराज को इस संसार में ऐश्वर्यपूर्ण पद तथा ब्रह्म में तदाकार होने की स्वच्छन्दता जैसे आशीर्वाद प्राप्त थे, किन्तु उन्होंने इन्हें अस्वीकार कर दिया। उन्होंने भगवान् के दासों के भी दास की सेवा में रत रहना श्रेयस्कर समझा। इसलिए बलि महाराज ने कहा है कि चूँकि उनके पितामह प्रह्लाद महाराज ने भौतिक ऐश्वर्य तथा बन्धन से मुक्ति जैसे श्रीभगवान् के आशीर्वादों को नकार दिया था, इसलिए वे आत्महित को भलीभाँति समझते थे।
 
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