श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 24: नीचे के स्वर्गीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
तस्यानुचरितमुपरिष्टाद्विस्तरिष्यते यस्य भगवान् स्वयमखिलजगद्गुरुर्नारायणो द्वारि गदापाणिरवतिष्ठते निजजनानुकम्पितहृदयो येनाङ्गुष्ठेन पदा दशकन्धरो योजनायुतायुतं दिग्विजय उच्चाटित: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—बलि महाराज का; अनुचरितम्—चरित्र, वर्णन; उपरिष्टात्—बाद के, परवर्ती (आठवें स्कंध में); विस्तरिष्यते—विस्तार से वर्णन किया जायेगा; यस्य—जिसका; भगवान्—श्रीभगवान्; स्वयम्—स्वयं; अखिल-जगत्-गुरु:—तीनों लोकों के गुरु; नारायण:—साक्षात् नारायण; द्वारि—द्वार पर; गदा-पाणि:—हाथ में गदा लिये हुए; अवतिष्ठते—खड़े रहते हैं; निज-जन- अनुकम्पित-हृदय:—जिनका हृदय अपने भक्तों के लिए सदैव दया से पूरित रहता है; येन—जिसके द्वारा; अङ्गुष्ठेन—बड़े अँगूठे से; पदा—अपने पाँव का; दश-कन्धर:—दश सिरों वाला, रावण; योजन-अयुत-अयुतम्—अस्सी हजार मील की दूरी; दिक्- विजये—बलि महाराज पर विजय प्राप्त करने हेतु; उच्चाटित:—फेंक दिया ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी बोले—हे राजन्, भला मैं बलि महाराज के चरित्र का कैसे गुणगान कर सकता हूँ? तीनों लोकों के स्वामी श्रीभगवान्, जो अपने भक्त पर अत्यन्त दयालु हैं, महाराज बलि के द्वार पर गदा धारण किये खड़े रहते हैं। जब पराक्रमी असुर रावण बलि महाराज पर विजय पाने के लिए आया तो वामनदेव ने उसे अपने पैर के अँगूठे से अस्सी हजार मील दूरी पर फेंक दिया। मैं बलि महाराज के चरित्र तथा कार्यकलापों का विस्तृत वर्णन आगे (आठवें स्कंध में) करूँगा।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥