श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 24: नीचे के स्वर्गीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
ततोऽधस्तान्महातले काद्रवेयाणां सर्पाणां नैकशिरसां क्रोधवशो नाम गण: कुहकतक्षककालियसुषेणादिप्रधाना महाभोगवन्त: पतत्‍त्रिराजाधिपते: पुरुषवाहादनवरतमुद्विजमाना: स्वकलत्रापत्यसुहृत्कुटुम्बसङ्गेन क्‍वचित्प्रमत्ता विहरन्ति ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तलातल लोक से; अधस्तात्—नीचे; महातले—महातल नामक लोक में; काद्रवेयाणाम्—कद्रू की सन्तानों का; सर्पाणाम्—जो सर्प है; न एक-शिरसाम्—जो अनेक फनों वाले हैं; क्रोध-वश:—सदैव क्रोध के वशीभूत; नाम—नामक; गण:—गण, समूह; कुहक—कुहक; तक्षक—तक्षक; कालिय—कालिय; सुषेण—सुषेण; आदि—इत्यादि; प्रधाना:— प्रमुख; महा-भोगवन्त:—समस्त प्रकार के भोगों में लिप्त; पतत्त्रि-राज-अधिपते:—समस्त पक्षियों के अधिपति, गरुड़ से; पुरुष-वाहात्—श्रीभगवान् को ले जाने वाला; अनवरतम्—निरन्तर; उद्विजमाना:—भयभीत; स्व—अपने आप; कलत्र- अपत्य—स्त्रियों तथा सन्तानों; सुहृत्—मित्र; कुटुम्ब—कुटुम्बीजन; सङ्गेन—साथ में; क्वचित्—कभी-कभी; प्रमत्ता:—क्रुद्ध; विहरन्ति—विहार करते हैं, खेलते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 तलातल के नीचे का लोक महातल कहलाता है। यह सदैव क्रुद्ध रहने वाले अनेक फनों वाले कद्रू की सर्प-सन्तानों का आवास है। इन सर्पों में कुहक, तक्षक, कालिय तथा सुषेण प्रमुख हैं। महातल के सारे सर्प भगवान् विष्णु के वाहन गरुड़ के भय से सदैव आतंकित रहते हैं, किन्तु चिन्तातुर होते हुए भी उनमें से कुछ अपनी पत्नियों, सन्तानों, मित्रों तथा कुटुम्बियों के साथ-साथ क्रीड़ाएँ करते रहते हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ यह बताया गया है कि महातल लोक के सर्प अत्यन्त शक्तिशाली तथा अनेक फनों वाले होते हैं। वे अपनी स्त्रियों तथा पुत्रों के साथ रहते हुए अपने को परम सुखी मानते हैं, यद्यपि उन्हें गरुड़ का भय बना रहता है जो उनको नष्ट करने के लिए वहाँ आता है। यही भौतिक जीवन का विधान है। भले ही कोई कितनी कठिन परिस्थिति में क्यों न रहे, तो भी वह अपनी पत्नी, पुत्र, मित्र तथा कुटुम्बीजनों के मध्य अपने को सुखी मानता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥