श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 24: नीचे के स्वर्गीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
तन्निशम्योभयत्रापि भगवता रक्षणाय प्रयुक्तं सुदर्शनं नाम भागवतं दयितमस्त्रं तत्तेजसा दुर्विषहं मुहु: परिवर्तमानमभ्यवस्थितो मुहूर्तमुद्विजमानश्चकितहृदय आरादेव निवर्तते तदुपरागमिति वदन्ति लोका: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—वह स्थिति; निशम्य—सुनकर; उभयत्र—सूर्य तथा चन्द्र दोनों के चारों ओर; अपि—निस्सन्देह; भगवता—श्रीभगवान् द्वारा; रक्षणाय—उनकी रक्षा हेतु; प्रयुक्तम्—संलग्न; सुदर्शनम्—श्रीकृष्ण का चक्र; नाम—नामक; भागवतम्—अत्यन्त विश्वासपात्र भक्त; दयितम्—अत्यन्त प्रिय; अस्त्रम्—आयुध; तत्—वह; तेजसा—अपने तेज से; दुर्विषहम्—असह्य गर्मी; मुहु:—बारम्बार; परिवर्तमानम्—सूर्य तथा चन्द्र की परिक्रमा करता हुआ; अभ्यवस्थित:—स्थित; मुहूर्तम्—एक मुहूर्त (४८मिनट) के लिए; उद्विजमान:—जिसका मन चिन्ताओं से पूर्ण है; चकित—चकित, डरा हुआ; हृदय:—हृदय; आरात्— सुदूर स्थान तक; एव—ही; निवर्तते—भागता है; तत्—वह स्थिति; उपरागम्—ग्रहण; इति—इस प्रकार; वदन्ति—कहते हैं; लोका:—लोग ।.
 
अनुवाद
 
 सूर्य तथा चन्द्र देवताओं से राहु के आक्रमण को सुन कर उनकी रक्षा हेतु भगवान् विष्णु अपना सुदर्शन चक्र चलाते हैं। यह चक्र भगवान् का अत्यन्त प्रिय भक्त और प्रिय पात्र है। अवैष्णवों के वध हेतु इसका प्रचण्ड तेज राहु के लिए असह्य है, अत: वह डर कर भाग जाता है। जब राहु चन्द्र या सूर्य को सताता है, तो ग्रहण लगता है।
 
तात्पर्य
 भगवान् विष्णु अपने भक्तों के, जिन्हें देवता भी कहा जाता है, सदैव ही रक्षक हैं। प्रधान देवता विष्णु के अत्यन्त आज्ञाकारी होते हैं, यद्यपि उन्हें भी भौतिक इन्द्रिय-भोग चाहिए और इसीलिए वे देवता या ईश्वरतुल्य माने जाते हैं। राहु सूर्य तथा चन्द्र पर आक्रमण करने का प्रयास करता है, किन्तु वे भगवान् विष्णु द्वारा रक्षित हैं। भगवान् विष्णु के चक्र से भयभीत रहने के कारण राहु सूर्य या चन्द्र के समक्ष एक मुहूर्त (४८ मिनट) से अधिक समय तक नहीं ठहर पाता। जब राहु सूर्य या चन्द्रमा के प्रकाश को रोक लेता है, तो यह घटना ग्रहण कहलाती है। पृथ्वी के विज्ञानियों का चन्द्रमा तक जाने का प्रयास राहु के आक्रमण के समान आसुरी है। निस्सन्देह उनके प्रयत्न विफल होंगे, क्योंकि कोई भी सूर्य या चन्द्रमा में सरलता से प्रवेश नहीं कर सकता। राहु के आक्रमण के समान ही ऐसे प्रयास निष्फल सिद्ध होंगे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥