श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 24: नीचे के स्वर्गीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
ततोऽधस्ताच्छतयोजनान्तर इयं पृथिवी यावद्धंसभासश्येनसुपर्णादय: पतत्‍त्रिप्रवरा उत्पतन्तीति ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
तत: अधस्तात्—इससे भी नीचे; शत-योजन—एक सौ योजन; अन्तरे—दूरी पर; इयम्—यह; पृथिवी—पृथ्वी; यावत्—जितना ऊँचा; हंस—हंस पक्षी; भास—गिद्ध; श्येन—बाज; सुपर्ण-आदय:—तथा अन्य पक्षीगण; पतत्त्रि-प्रवरा:—पक्षियों में श्रेष्ठ; उत्पतन्ति—उड़ सकते हैं; इति—इस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 यक्षों तथा राक्षसों के आवासों के नीचे १०० (८०० मील) योजन की दूरी पर पृथ्वी ग्रह है। इसकी ऊपरी सीमा उतनी ऊँचाई तक है जहाँ तक हंस, गिद्ध, बाज तथा अन्य बड़े पक्षी उड़ सकते हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥