श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 24: नीचे के स्वर्गीय लोकों का वर्णन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
एतेषु हि बिलस्वर्गेषु स्वर्गादप्यधिककामभोगैश्वर्यानन्दभूतिविभूतिभि: सुसमृद्धभवनोद्यानाक्रीडविहारेषु दैत्यदानवकाद्रवेया नित्यप्रमुदितानुरक्तकलत्रापत्यबन्धुसुहृदनुचरा गृहपतय ईश्वरादप्यप्रतिहतकामा मायाविनोदा निवसन्ति ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
एतेषु—इसमें से; हि—निश्चय ही; बिल-स्वर्गेषु—अध:-स्वर्ग लोकों में; स्वर्गात्—स्वर्गलोकों की अपेक्षा; अपि—भी; अधिक—बढक़र; काम-भोग—इन्द्रियभोग का सुख; ऐश्वर्य-आनन्द—ऐश्वर्यजन्य आनन्द; भूति—प्रभाव; विभूतिभि:— वस्तुओं तथा सम्पत्ति से; सु-समृद्ध—उन्नत; भवन—घर; उद्यान—उपवन, बगीचे; आक्रीड-विहारेषु—इन्द्रियतृप्ति के लिए नाना प्रकार के क्रीड़ा स्थलों में; दैत्य—दैत्य, असुर; दानव—भूत-प्रेत; काद्रवेया:—सर्प; नित्य—शाश्वत; प्रमुदित—अत्यधिक प्रसन्न; अनुरक्त—लगाव के कारण; कलत्र—पत्नी को; अपत्य—बच्चे; बन्धु—सगे सम्बन्धी; सुहृत्—मित्र; अनुचरा:— अनुचर; गृह-पतय:—गृहस्वामी, घर का मुखिया; ईश्वरात्—देवताओं के तुल्य अधिक सक्षम जनों की अपेक्षा; अपि—भी; अप्रतिहत-कामा:—जिनकी कामेच्छा रोके नहीं रुकती; माया—मायामय; विनोदा:—जो सुख का अनुभव करते हैं; निवसन्ति—निवास करते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 बिल स्वर्ग (नीचे के स्वर्ग) कहलाने वाले इन सातों लोकों में अत्यन्त सुन्दर घर, उद्यान तथा क्रीड़ास्थलियाँ हैं, जो स्वर्गलोक से भी अधिक ऐश्वर्यशाली हैं, क्योंकि असुरों के विषय भोग, सम्पत्ति तथा प्रभाव के मानक बहुत ऊँचे हैं। इन लोकों के वासी दैत्य, दानव तथा नाग कहलाते हैं और उनमें से बहुत से गृहस्थों की भाँति रहते हैं। उनकी पत्नियाँ, सन्तानें, मित्र तथा उनका समाज मायामय भौतिक सुख में पूरी तरह मग्न रहता है। भले ही देवताओं के ऐन्द्रिय सुख में कभी-कभी बाधा आए, किन्तु इन लोकों के वासी अबाध जीवन व्यतीत करते हैं। इस प्रकार उन्हें मायामय सुख में अत्यधिक लिप्त माना जाता है।
 
तात्पर्य
 प्रह्लाद महाराज के कथना नुसार भौतिक सुख मायासुख कहलाता है। वैष्णव सदैव ऐसे झूठे सुख से जीवों को मुक्ति दिलाने के लिए चिन्तित रहता है। प्रह्लाद महाराज कहते हैं—मायासुखाय भरमुद्वहतो विमूढान्—ये मूर्ख (विमूढ़) क्षणिक भौतिक सुख में लिप्त रहते हैं। चाहे स्वर्गलोक हो या अधोलोक अथवा मर्त्यलोक, लोग सर्वत्र क्षणिक भौतिक सुख में लिप्त रहते हैं और यह भूल जाते हैं कि यथासमय उन्हें भौतिक नियमों के अनुसार अपना शरीर बदलना होगा और जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के आवागमन में पडऩा होगा। अगले जन्म की परवाह किये बिना नितान्त भौतिकतावादी अपने लघु जीवन-काल में आनन्द-भोग करने में मस्त रहना चाहते हैं। ऐसे विमूढ़ भौतिकतावादियों को आध्यात्मिक आनन्द का वास्तविक सुख प्रदान करने के लिए वैष्णव सदैव उत्सुक रहता है।
 
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