श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 25: भगवान् अनन्त की महिमा  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
तस्य मूलदेशे त्रिंशद्योजनसहस्रान्तर आस्ते या वै कला भगवतस्तामसी समाख्यातानन्त इति सात्वतीया द्रष्टृद‍ृश्ययो: सङ्कर्षणमहमित्यभिमानलक्षणं यं सङ्कर्षणमित्याचक्षते ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी बोले; तस्य—पाताललोक के; मूल-देशे—मूलभाग में; त्रिंशत्—तीस; योजन—आठ मील की दूरी की इकाई; सहस्र-अन्तरे—एक हजार (योजन) की दूरी पर; आस्ते—स्थित है; या—जो; वै—निश्चय ही; कला—अंश का अंश; भगवत:—श्रीभगवान् का; तामसी—अंधकार से सम्बन्धित; समाख्याता—कहलाने वाला; अनन्त:— अनन्त; इति—इस प्रकार; सात्वतीया:—भक्तगण; द्रष्टृ-दृश्ययो:—पदार्थ तथा आत्मा का; सङ्कर्षणम्—परस्पर आकर्षित करने वाला; अहम्—मैं; इति—इस प्रकार; अभिमान—आत्म-सम्मान; लक्षणम्—लक्षण; यम्—जिसको; सङ्कर्षणम्—संकर्षण; इति—इस प्रकार; आचक्षते—विद्वान कहते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित से कहा—हे राजन्, पाताल लोक से २,४०,००० मील नीचे श्रीभगवान् के एक अन्य अवतार निवास करते हैं। वे भगवान् अनन्त अथवा भगवान् संकर्षण कहलाते हैं और भगवान् विष्णु के अंश हैं। वे सदैव दिव्य पद पर आसीन हैं, किन्तु तमोगुणी देवता भगवान् शिव के आराध्य होने के कारण कभी-कभी तामसी कहलाते हैं। भगवान् अनन्त सभी बद्धजीवों के अहं तथा तमोगुण के प्रमुख देवता हैं। जब बद्धजीव यह सोचता है कि यह संसार भोग्य है और मैं उसका भोक्ता हूँ तो यह जीवन-दृष्टि संकर्षण द्वारा प्रेरित होती है। इस प्रकार संसारी बद्धजीव स्वयं को ही परमेश्वर मानने लगता है।
 
तात्पर्य
 मायावादी दार्शनिकों की तरह ही मनुष्यों का एक वर्ग है जो अहं ब्रह्मास्मि तथा सोऽहं वैदिक मन्त्रों का अर्थ “मैं ही परब्रह्म हूँ” तथा “मैं ईश्वर से अभिन्न हूँ” लगाता है। इस प्रकार की झूठी विचारधारा एक प्रकार का मोह है। इसका वर्णन श्रीमद्भागवत (५.५.८) में जनस्य मोहोऽयमहं ममेति के रूप में हुआ है। जैसाकि उपर्युक्त श्लोक में कहा गया है इस झूठी विचारधारा के प्रेरक श्रीमूर्ति भगवान् संकर्षण हैं। श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता (१५.१५) में इसकी पुष्टि की है— सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्त:स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।

“मैं सब प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति उत्पन्न होती है।” ईश्वर सबों के हृदयों में संकर्षण रूप में स्थित हैं और जब कोई असुर अपने आपको परमेश्वर से एकाकार मानता है, तो ईश्वर उसे उस अंधकार में रहने देते हैं। यद्यपि ऐसा आसुरी जीव परमेश्वर का एक नगण्य विभिन्नांश मात्र होता है, किन्तु जीव अपनी वास्तविक स्थिति को भूलकर अपने को परमेश्वर समझने लगता है। चूँकि ऐसी विस्मृति भगवान् संकर्षण द्वारा उत्पन्न की जाती है इसलिए कभी-कभी उन्हें तामसी कहा जाता है। तामसी शब्द से यह इंगित नहीं होता कि उनका भौतिक शरीर है। वे सदैव दिव्य है, किन्तु तामसी कार्यों के कर्ता भगवान् शिव की परम-आत्मा होने के कारण संकर्षण कभी-कभी तामसी कहलाते हैं।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥