श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 25: भगवान् अनन्त की महिमा  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
मूर्तिं न: पुरुकृपया बभार सत्त्वं
संशुद्धं सदसदिदं विभाति तत्र ।
यल्लीलां मृगपतिराददेऽनवद्या-
मादातुं स्वजनमनांस्युदारवीर्य: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
मूर्तिम्—श्रीभगवान् के विविध रूपों को; न:—हमको; पुरु-कृपया—अत्यन्त कृपाकरके; बभार—प्रदर्शित किया; सत्त्वम्— अस्तित्त्व; संशुद्धम्—नितान्त दिव्य; सत्-असत् इदम्—कार्य-कारण स्वरूप यह भौतिक जगत; विभाति—प्रकाशित होता है; तत्र—जिसमें; यत्-लीलाम्—जिनकी लीलाएँ; मृग-पति:—सिंह के समान समस्त जीवों का स्वामी; आददे—शिक्षा दी; अनवद्याम्—कल्मषहीन; आदातुम्—जीतने के लिए; स्व-जन-मनांसि—अपने भक्तों के मन में; उदार-वीर्य:—जो अत्यन्त उदार एवं शक्तिमान है ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के भीतर स्थूल व सूक्ष्म जगत का अस्तित्व विद्यमान है। अपने भक्तों पर अहैतुकी कृपावश वे विभिन्न दिव्य रूपों को प्रदर्शित करते हैं। परमेश्वर अत्यन्त उदार हैं एवं उनमें समस्त योग शक्तियाँ हैं। अपने भक्तों के मन को जीतने तथा उनके हृदय को आनन्दित करने के लिए वे नानाविध अवतारों में प्रकट होते हैं और अनेक लीलाएँ करते हैं।
 
तात्पर्य
 श्रील जीव गोस्वामी ने इस श्लोक का अनुवाद इस प्रकार किया है—“श्रीभगवान् समस्त कारणों के कारण स्वरूप हैं। उनकी इच्छा से ही स्थूल तथा सूक्ष्म अवयव परस्पर क्रिया करते हैं। वे अपने शुद्ध भक्तों के हृदयों को प्रमुदित करने के लिए ही विभिन्न रूपों में अवतरित होते हैं।” उदाहरणार्थ, अपने भक्त को प्रसन्न करने के लिए परमेश्वर पृथ्वी को गर्भोदक सागर से उठाने के लिए भगवान् वराह के दिव्य रूप में अवतरित हुए।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥