श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 25: भगवान् अनन्त की महिमा  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
यन्नाम श्रुतमनुकीर्तयेदकस्मा-
दार्तो वा यदि पतित: प्रलम्भनाद्वा ।
हन्त्यंह: सपदि नृणामशेषमन्यं
कं शेषाद्भ‍गवत आश्रयेन्मुमुक्षु: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जिनका; नाम—पवित्र नाम; श्रुतम्—सुना हुआ; अनुकीर्तयेत्—जप सकता है; अकस्मात्—दैवयोग से; आर्त:— विपदाग्रस्त व्यक्ति; वा—अथवा; यदि—यदि; पतित:—पतित व्यक्ति; प्रलम्भनात्—हँसी से; वा—अथवा; हन्ति—नष्ट करता है; अंह:—पापी; सपदि—उस क्षण; नृणाम्—मानव समाज का; अशेषम्—अपरिमित; अन्यम्—दूसरे को; कम्—क्या; शेषात्—भगवान् शेष की अपेक्षा; भगवत:—श्रीभगवान् की; आश्रयेत्—शरण में जावे; मुमुक्षु:—मुक्तिकामी व्यक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 यदि कोई आर्त अथवा पतित व्यक्ति भी प्रामाणिक गुरु से भगवान् का पवित्र नाम सुनकर उसका जप करता है, तो वह तुरन्त पवित्र हो जाता है। यदि वह हँसी में, अथवा अकस्मात् भी भगवन्नाम का जप करता है, तो वह तथा जो उसे सुनता है समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं। अत: भौतिक बन्धनों से छुटकारा चाहने वाला व्यक्ति भगवान् शेष के नाम-जप से कैसे कतरा सकता है? भला वह और किसकी शरण ग्रहण करे?
 
 
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