श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 25: भगवान् अनन्त की महिमा  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक
एवम्प्रभावो भगवाननन्तो
दुरन्तवीर्योरुगुणानुभाव: ।
मूले रसाया: स्थित आत्मतन्त्रो
यो लीलया क्ष्मां स्थितये बिभर्ति ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्-प्रभाव:—इतना शक्तिशाली; भगवान्—श्रीभगवान्; अनन्त:—अनन्त; दुरन्त-वीर्य—अपार शौर्य; उरु—महान्; गुण- अनुभाव:—दिव्य गुणों तथा यशों से युक्त; मूले—पादभाग में; रसाया:—निम्नतर लोकों के; स्थित:—स्थित; आत्म-तन्त्र:— पूर्णतया आत्मनिर्भर; य:—जो; लीलया—सरलतापूर्वक; क्ष्माम्—ब्रह्माण्ड को; स्थितये—पालन हेतु; बिभर्ति—धारण करता है ।.
 
अनुवाद
 
 उन शक्तिमान भगवान् अनन्तदेव के महान् एवं यशस्वी गुणों का कोई पारावार नहीं है। वास्तव में उनका शौर्य अनन्त है। स्वयं आत्मनिर्भर होते हुए भी वे प्रत्येक वस्तु के आधार हैं। वे पाताललोक में वास करते हैं और इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को धारण किये रहते हैं।
 
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥