श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 25: भगवान् अनन्त की महिमा  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
यस्य ह वा इदं कालेनोपसञ्जिहीर्षतोऽमर्षविरचितरुचिरभ्रमद्भ्रुवोरन्तरेण साङ्कर्षणो नाम रुद्र एकादशव्यूहस्‍त्र्यक्षस्त्रिशिखं शूलमुत्तम्भयन्नुदतिष्ठत् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
यस्य—जिसका; ह वा—निस्सन्देह; इदम्—यह (जगत); कालेन—कालक्रम से; उपसञ्जिहीर्षत:—संहार करने की कामना करते हुए; अमर्ष—क्रोध से; विरचित—निर्मित; रुचिर—अत्यन्त सुन्दर; भ्रमत्—घूमते हुए; भ्रुवो:—भृकुटियाँ के; अन्तरेण— भीतर से; साङ्कर्षण: नाम—सांकर्षण नामक; रुद्र:—भगवान् शिव के अवतार, रुद्र; एकादश-व्यूह:—ग्यारह विस्तारों वाला; त्रि-अक्ष:—तीन नेत्र; त्रि-शिखम्—तीन नोकों वाले; शूलम्—त्रिशूल; उत्तम्भयन्—उठाते हुए; उदतिष्ठत्—उठा ।.
 
अनुवाद
 
 प्रलयकाल उपस्थित होने पर जब भगवान् अनन्तदेव सम्पूर्ण सृष्टि का संहार करना चाहते हैं, तो वे कुछ क्रुद्ध हो जाते हैं। तब उनकी दोनों भृकुटियों के बीच से त्रिशूल धारण किये हुए त्रिनेत्र रुद्र प्रकट होते हैं। यह रुद्र, जो संकर्षण कहलाते हैं, ग्यारह रुद्रों, अर्थात् भगवान् शिव के अवतारों का व्यूह होता है। वे सम्पूर्ण सृष्टि के संहार हेतु प्रकट होते हैं।
 
तात्पर्य
 प्रत्येक सृष्टि में जीवात्माओं को अवसर प्रदान किया जाता है कि वे बद्ध जीवत्माओं के रूप में अपने कार्यकलाप समाप्त कर लें। जब वे इस अवसर का दुरुपयोग करती हैं और भगवान् के धाम को वापस नहीं जातीं तो भगवान् संकर्षण क्रोधित होते हैं। क्रोध के कारण भगवान् संकर्षण की भृकुटियों से भगवान् शिव के अंश रूप ग्यारह रुद्र प्रकट होते हैं और वे सब मिलकर सम्पूर्ण सृष्टि का संहार कर देते हैं।
 
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