श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 25: भगवान् अनन्त की महिमा  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
स एव भगवाननन्तोऽनन्तगुणार्णव आदिदेव उपसंहृतामर्षरोषवेगो लोकानां स्वस्तय आस्ते ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; एव—निश्चय ही; भगवान्—श्रीभगवान्; अनन्त:—अनन्तदेव; अनन्त-गुण-अर्णव:—असीम दिव्य गुणों के सागर; आदि-देव:—आदि ईश्वर अथवा आद्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से अभिन्न रूप; उपसंहृत—जिसने इन्द्रियनिग्रह किया है; अमर्ष—उसकी असहनशीलता का; रोष—(तथा) क्रोध; वेग:—वेग, शक्ति; लोकानाम्—सभी लोकों के मनुष्यों के; स्वस्तये—कल्याण हेतु; आस्ते—रहते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् संकर्षण अनन्त दिव्य गुणों के सागर हैं जिससे वे अनन्तदेव कहलाते हैं। वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से अभिन्न हैं। इस जगत के समस्त जीवों के कल्याण हेतु वे अपने क्रोध तथा अपनी असहनशीलता को रोके हुए अपने धाम में निवास करते हैं।
 
तात्पर्य
 अनन्तदेव का मूल उद्देश्य इस भौतिक सृष्टि को विलय करना हैं, किन्तु वे अपने रोष तथा अमर्ष को रोके रहते हैं। इस जगत की सृष्टि बद्ध-जीवात्माओं को भगवान् के धाम जाने के लिए एक और अवसर प्रदान करने के लिए की जाती है, किन्तु अधिकांश जीव इस अवसर का लाभ नहीं उठाते। सृष्टि के बाद वे भौतिक जगत पर फिर से अपना प्रभुत्व जताना चाहते हैं। इन क्रियाओं से अनन्तदेव क्रुद्ध हो उठते हैं और सम्पूर्ण भौतिक जगत को विनष्ट कर देना चाहते हैं। किन्तु श्रीभगवान् होने के कारण वे हम पर दयालु हैं और अपने रोष तथा अमर्ष को रोक लेते हैं। कभी-कभी ही वे अपना रोष प्रकट करते हैं और भौतिक जगत का विनाश कर देते हैं।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥