श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 25: भगवान् अनन्त की महिमा  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक
उत्पत्तिस्थितिलयहेतवोऽस्य कल्पा:
सत्त्वाद्या: प्रकृतिगुणा यदीक्षयाऽऽसन्॒ ।
यद्रूपं ध्रुवमकृतं यदेकमात्मन्
नानाधात्कथमु ह वेद तस्य वर्त्म ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
उत्पत्ति—सृजन का; स्थिति—धारण या पालन; लय—(तथा) संहार या प्रलय; हेतव:—मूल कारण; अस्य—इस जगत के; कल्पा:—समर्थ होते हैं; सत्त्व-आद्या:—सत्त्वगुण इत्यादि; प्रकृति-गुणा:—भौतिक प्रकृति के गुण; यत्—जिसकी; ईक्षया— दृष्टि मात्र से; आसन्—हो गया; यत्-रूपम्—जिसका स्वरूप; ध्रुवम्—अपरिमित; अकृतम्—बिना उत्पत्ति हुए; यत्—जो; एकम्—एक; आत्मन्—स्वयं में; नाना—अनेक; अधात्—प्रकट हुआ; कथम्—कैसे; उ ह—निश्चय ही; वेद—जान सकता है; तस्य—उसका; वर्त्म—पथ, मार्ग ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की दृष्टि फेरने से ही जगत की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय के कारणस्वरूप भौतिक प्रकृति के गुणों को अपने-अपने कार्य में समर्थ कर देते हैं। परमात्मा अनन्त तथा अनादि हैं और एक होते हुए भी अपने को नाना रूपों में प्रकट करते हैं। भला ऐसे परमेश्वर के कार्यों को मानव समाज कैसे जान सकता है?
 
तात्पर्य
 वेदों से हमें ज्ञात होता है कि परमेश्वर भौतिक प्रकृति पर दृष्टि डालते (स ऐक्षत ) हैं तो प्रकृति के तीन प्रकार के गुण प्रकट होते हैं और भौतिक जगत उत्पन्न होता है और भौतिक विविधता सृजित होती है। जब तक वे भौतिक शक्ति पर दृष्टिपात नहीं करते, तब तक इस भौतिक जगत की सृष्टि, पालन और लय की कोई सम्भावना नहीं रहती। ईश्वर सृष्टि के पहले से विद्यमान हैं फलत: वे सनातन और अपरिवर्तनशील हैं। अत: कोई कितना भी महान् विज्ञानी या दार्शनिक क्यों न हो, वह श्रीभगवान् के कार्यों की विधि को कैसे जान सकता है? चैतन्यभागवत (आदि खण्ड १.४८-५२ तथा १.५८-६९) के निम्नलिखित उद्धरण भगवान् अनन्त के यश को बताने वाले हैं—

कि ब्रह्मा, कि शिव, कि सनकादि ‘कुमार’।

व्यास, शुक, नारदादि, ‘भक्त’ नाम याँर ॥

“ब्रह्माजी, शिवजी, चारों कुमार (सनक, सनातन, सनन्दन तथा सनत्कुमार), व्यासदेव, शुकदेव गोस्वामी तथा नारद—ये सभी ईश्वर के शुद्ध भक्त अथवा सनातन दास हैं।

सबार पूजित श्री-अनन्त-महाशय।

सहस्र-वदन प्रभु—भक्ति-रसमय ॥

“उपर्युक्त ये सभी विशुद्ध भक्तजन भगवान् श्री अनन्त की आराधना करते हैं। वे सहस्र फणों वाले तथा समस्त भक्ति के आगार हैं।

आदिदेव, महा-योगी, ‘ईश्वर’, ‘वैष्णव’।

महिमार अन्त इँहा ना जानये सब ॥

“भगवान् अनन्त आदिपुरुष तथा योग के महान् नियन्ता हैं। साथ ही वे भगवान् के दास या वैष्णव हैं। उनकी महिमा का कोई अन्त नहीं है, अत: उन्हें पूर्णतया नहीं समझा जा सकता। सेवन शुनिला, एबे शुन ठाकुराल।

आत्म-तंत्रे येन-मते वैसेन पाताल ॥

“ईश्वर के प्रति उनके सेवाभाव का मैं पहले ही वर्णन कर चुका हूँ, अब आप सुनें कि आत्मनिर्भर अनन्तदेव पाताललोक में किस प्रकार अवस्थित हैं।

श्री-नारद-गोसाञि ‘तुम्बुरु’ करि’ संगे।

से यश गायेन ब्रह्मा-स्थाने श्लोक-वंधे ॥

“महामुनि नारद अपने कंधे पर तुम्बुरु धारण किये हुए भगवान् अनन्त की महिमा का सदैव गायन करते रहते हैं। उन्होंने भगवान् की प्रशंसा में अनेक दिव्य श्लोकों की रचना की है। सृष्टि, स्थिति, प्रलय, सत्त्वादि यत गुण।

याँर दृष्टि-पाते हय, याय पुन: पुन: ॥

“भगवान् अनन्त की दृष्टिमात्र से प्रकृति के तीनों गुणों की अन्त:क्रिया होती है और सृष्टि, स्थिति तथा प्रलय उत्पन्न होते हैं। ये गुण पुन: पुन: प्रकट होते रहते हैं।

अद्वितीय-रूप, सत्य अनादि महत्त्व।

तथापि ‘अनन्त’ हय, के बुझे से तत्त्व? “भगवान् अद्वितीय तथा अनादि सत्य रूप हैं, अत: वे अनन्तदेव कहलाते हैं। भला उन्हें कौन समझ सकता है? शुद्ध-सत्त्व-मूर्ति प्रभु धरेन करुणाय।

ये-विग्रहे सबार प्रकाश सुलीलाय ॥

“उनका स्वरूप पूर्णत: आध्यात्मिक है और वे केवल अपनी करुणा से उसे प्रकट करते हैं। इस भौतिक जगत के सारे कार्यकलाप केवल उन्हीं के रूप के द्वारा संचालित हैं।

याँहारा तरंग शिखि’ सिंह महावली।

निज-जन-मनो रञ्जे हञा कुतूहली ॥

“वे अत्यन्त शक्तिशाली हैं और अपने पार्षदों तथा भक्तों को प्रसन्न करने के लिए सदा तत्पर रहते हैं।

ये अनन्त-नामेर श्रवण-संकीर्तने।

ये-ते मते केने नाहि बोले ये-ते जने ॥

अशेष-जन्मेर बंध छिण्डे सेइ-क्षणे।

अतएव वैष्णव ना छाड़े कभु ताने ॥

“यदि हम भगवान् अनन्तदेव की महिमा का सामूहिक कीर्तन करने के प्रयास में लग जाँए तो जन्म-जन्मांतरों से एकत्र हमारे मन के कल्मष तुरन्त धुल जाँय। अत: वैष्णवजन अनन्तदेव की महिमागान का अवसर हाथ से नहीं जाने देते।

‘शेष’ ब-इ संसारेर गति नाहिं आर।

अनन्तेर नामे सर्व-जीवेर उद्धार ॥

“भगवान् अनन्त शेष (अपरिमित अन्त) कहलाते हैं, क्योंकि वे इस भौतिक जगत से होकर जाने वाले हमारे मार्ग का अन्त करने वाले हैं। उनकी महिमा के कीर्तन मात्र से प्रत्येक प्राणी मुक्त हो सकता है।

अनन्त पृथिवी-गिरि समुद्र-सहिते।

ये-प्रभु धरेन गिरे पालन करिते ॥

“अनन्तदेव अपने सिर पर विशाल सागर तथा पर्वतों से युक्त लाखों ग्रहों वाले सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को धारण करते हैं।

सहस्र फणार एक-फणे ‘बिन्दु’ येन।

अनन्त विक्रम, ना जानेन, ‘आछे’ हेन ॥

“वे इतने विराट एवं शक्तिमान हैं कि यह ब्रह्माण्ड उनके एक फण पर जलबिन्दु के समान टिका हुआ है। वे नहीं जान पाते कि यह कहाँ पर हैं।

सहस्र-वदने कृष्ण-यश निरन्तर।

गाइते आछेन आदि-देव मही-धर ॥

“श्रीअनन्तदेव अपने एक फण में ब्रह्माण्ड को धारण किये अपने सहस्रों मुखों से श्रीकृष्ण का यशोगान करते हैं।

गायेन अनन्त, श्री-यशेर नाहिं अन्त।

जय-भंग नाहि कारु, दोंहे—बलवन्त ॥

“यद्यपि वे अनन्तकाल से भगवान् श्रीकृष्ण का यशोगान करते रहे हैं, किन्तु उसका कोई अन्त नहीं मिला है।

अद्यापिह ‘शेष’-देव सहस्र-श्रीमुखे।

गायेन चैतन्य-यश अन्त नाहिं देखे ॥

“आज भी भगवान् अनन्त श्री चैतन्य महाप्रभु के यश का गान कर रहे हैं और इसका कोई अन्त नहीं है।”

 
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