श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 5: सृष्टि की प्रेरणा  »  अध्याय 25: भगवान् अनन्त की महिमा  » 
 
 
 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में शुकदेव गोस्वामी भगवान् शिव के उत्स अनन्त का वर्णन किया है जिनका शरीर पूर्णतया आध्यात्मिक हैं। भगवान् अनन्त पाताल लोक के मूल में निवास करते हैं। वे भगवान् शिव के हृदय-देश में सदैव निवास करने वाले हैं और इस ब्रह्माण्ड का संहार करने में इनकी सहायता करते हैं। अनन्त बताते हैं कि इस विश्व का कैसे संहार हो इसलिए वे कभी-कभी तामसी अर्थात् तमोगुणी कहे जाते हैं। वे भौतिक चेतना के अधिष्ठाता देव हैं और चूँकि वे समस्त जीवों को आकृष्ट कर लेते हैं, इसलिए कभी-कभी वे संकर्षण भी कहलाते हैं। यह सम्पूर्ण भौतिक जगत भगवान् संकर्षण के फणों पर टिका है। वे अपने शिर के अग्रभाग से भगवान् शिव को इस भौतिक जगत के संहार हेतु शक्ति प्रदान करते हैं। चूँकि संकर्षण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के स्वांश हैं,
इसलिए अनेक भक्तजन उनकी स्तुति करते हैं और पाताललोक के समस्त सुर, असुर, गंर्धव, विद्याधर तथा ऋषि-मुनि उनको सादर नमस्कार करते हैं। भगवान् उनसे मृदु वाणी बोलते हैं। उनका शरीर पूर्णतया चिन्मय एवं अत्यन्त मनोहर है। जो कोई किसी प्रामाणिक गुरु से उनके सम्बन्ध में सुनता है, वह समस्त भवबन्धनों से छूट जाता है। सम्पूर्ण भौतिक शक्ति (माया) अनन्तदेव की योजना के अनुसार क्रियाशील है। अत: उन्हें इस भौतिक सृष्टि का मूल कारण मानना चाहिए। उनके बल का कोई अन्त नहीं है, न ही असंख्य मुखों से उनका कोई पूर्ण वर्णन ही कर सकता है। इसलिए वे अनन्त कहे जाते हैं। समस्त जीवों के प्रति दयालु होने के कारण उनका चिन्मय शरीर प्रकट हुआ। शुकदेव गोस्वामी महाराज परीक्षित् से अनन्तदेव के यश का वर्णन इस प्रकार करते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥