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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 5: नारद द्वारा वसुदेव को दी गई शिक्षाओं का समापन  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  11.5.49 
मापत्यबुद्धिमकृथा: कृष्णे सर्वात्मनीश्वरे ।
मायामनुष्यभावेन गूढैश्वर्ये परेऽव्यये ॥ ४९ ॥
 
शब्दार्थ
मा—मत; अपत्य-बुद्धिम्—आपका पुत्र होने का विचार; अकृथा:—लादो; कृष्णे—कृष्ण पर; सर्व-आत्मनि—सबों के परमात्मा; ईश्वरे—ईश्वर; माया—अपनी मायाशक्ति द्वारा; मनुष्य-भावेन—सामान्य पुरुष की भाँति प्रकट होकर; गूढ-ऐश्वर्ये— अपने ऐश्वर्य को छिपाते हुए; परे—परम; अव्यये—अच्युत ।.
 
अनुवाद
 
 कृष्ण को सामान्य बालक मत समझिये, क्योंकि वे भगवान्, अव्यय तथा सबों के आत्मा हैं। भगवान् ने अपने अचिन्त्य ऐश्वर्य को छिपा रखा है, इसीलिए वे बाहर से सामान्य मनुष्य जैसे प्रतीत होते हैं।
 
तात्पर्य
 परम सत्य के समस्त स्वांश अवतारों के मूल स्रोत श्रीकृष्ण हैं। कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्। उनका असीम ऐश्वर्य अक्षय है और इस तरह वे समग्र सृष्टि को आसानी से अपने वश में कर लेते हैं।

भगवान् कृष्ण हर जीव के हितैषी हैं, अतएव वसुदव को अपने भावी गन्तव्य के विषय में न तो चिन्ता करने की कोई बात थी, न ही कृष्ण के अन्य संगियों यथा यदुकुल के सदस्यों की। इसी अध्याय के ४६वें श्लोक में नारद मुनि ने वसुदेव को बतलाया था—पुत्रतामगमद् यद् वां भगवान् ईश्वरो हरि:— “अब आप तथा आपकी पत्नी ब्रह्माण्ड-भर में प्रशंसित हो चुके हैं, क्योंकि साक्षात् भगवान् कृष्ण आपके पुत्र बने हैं।” इस तरह नारद ने वसुदेव को उत्साहित किया कि वे कृष्ण से अपने सर्वप्रिय पुत्र के रूप में प्रेम करते रहें, क्योंकि ऐसे भक्तिपूर्ण भावों को कभी भी त्यागना नहीं चाहिए। किन्तु इसी के साथ वसुदेव के भविष्य विषयक संशय को दूर करते हुए नारद आश्वस्त करते हैं “कृष्ण के प्रेम के कारण आप उन्हें सामान्य व्यक्ति मान सकते हैं। आप मनुष्य रूप में प्रकट हुए हैं और कृष्ण आपसे मात्र आदान-प्रदान कर रहे हैं। अपने को आपके पुत्र रूप में प्यार करते रहने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए वे अपने को आपके वश में किये हुए हैं। इस तरह उनकी अचिन्त्य शक्ति तथा ऐश्वर्य आपसे छिपे हुए हैं। किन्तु यह मत मान लीजिएगा कि इस जगत की घटनाओं के कारण कोई विकट स्थिति आ सकती है। यद्यपि कृष्ण आपके वश में प्रतीत होते हैं, किन्तु वे हैं परम नियन्ता। इसलिए उन्हें मनुष्य मत मानिये। वे तो सदैव भगवान् हैं।”

इस श्लोक का माया शब्द सूचित करता है कि कृष्ण की मनुष्य जैसी क्रियाएँ सामान्य व्यक्ति को भ्रम में डालने वाली हैं, क्योंकि कृष्ण भगवान् हैं। माया का अन्य अर्थ “दिव्य शक्ति” भी है। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है—सम्भवाम्यात्ममायया—भगवान् अपने दिव्य रूप में दिव्य शक्तियों से पूरित होकर अवतरित होते हैं। इस तरह मायामनुष्यभावेन शब्दों से कृष्ण का आदि स्वरूप सूचित होता है, जो इस जगत में मनुष्य जैसा लगता है। संस्कृत कोश के अनुसार माया “कृपा” का भी सूचक है, अतएव भगवान् के अवतार को बद्धजीवों पर उनकी अहैतुकी कृपा भी माना जाता है। भगवान् का अवतरण उन मुक्तात्माओं पर भी उनकी अहैतुकी कृपा है, जो भगवान् की लीलाओं तथा कीर्तन एवं श्रवण जैसे कार्यों में परमानन्द का अनुभव करते हैं (श्रवणं कीर्तनं विष्णो:)।

अपने प्रति वसुदेव के प्रेम का प्रतिदान करने के उद्देश्य से कृष्ण अपने असीम ऐश्वर्य को गुप्त रखते हैं। इस तरह भक्त को भगवान् के साथ अपना विशेष प्रेम-सम्बन्ध बनाये रखने में प्रोत्साहन मिलता है। किन्तु जब वसुदेव ब्राह्मण-शाप से उत्पन्न भीषण स्थिति से चिन्तामग्न थे, तो नारद ने स्मरण कराया कि ऐसी चिन्ता व्यर्थ है, क्योंकि ये सारी घटनाएँ भगवान् के अधीन हैं। अतएव वे वैष्णव परमहंस, जो भगवान् के माता-पिता के पद पर हैं, सदैव भगवान् की शरण में रहते हैं और भगवद्भक्ति से कभी विचलित नहीं होते। वे देहात्म बुद्धि वाले सामान्य माता-पिता से विपरीत सभी परिस्थितियों में दिव्य स्थिति में लीन रहे आते हैं।

 
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